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हम देखते ही रह गए दिल का मकाँ जलता हुआ

2212 2212 2212 2212

आसां कहाँ यह इश्क था मत पूछिए क्या क्या हुआ ।
हम देखते ही रह गए दिल का मकाँ  जलता हुआ ।।

हैरान है पूरा नगर कुछ तो है तेरी भी ख़ता ।
आखिर मुहब्बत पर तेरी क्यों आजकल पहरा हुआ ।।

पूरी कसक तो रह गयी इस तिश्नगी के दौर में ।
लौटा तेरी महफ़िल से वो फिर हाथ को मलता हुआ ।।

दरिया से मिलने की तमन्ना खींच लायेगी उसे ।
बेशक़ समंदर आएगा साहिल तलक  हंसता हुआ ।।

मुमकिन कहाँ है जख्म गिन पाना नये हालात में ।
घायल मिला है वह मुसाफ़िर वक्त का मारा हुआ ।।

यूँ ही ख़फ़ा क्यूँ हो गए किसने कहा कुछ आपको ।
क्यों मुस्कुराना आपका बेइंतिहा महँगा हुआ ।।

जब आसमाँ से चाँद उतरा था मेरे घर दफ़अतन ।
इस शह्र में इस बात का भी मुख़्तलिफ़ चर्चा हुआ ।।

जब सर उठाने हम चले खींचे गये तब पांव ये ।
उनको गवारा था कहाँ देखें हमें उठता हुआ ।।

अब इस कफ़स के दायरे से खुद को तू आज़ाद कर।
कहता गया मुझसे परिंदा फिर कोई उड़ता हुआ ।।

           --नवीन मणि त्रिपाठी
           मौलिक अप्रकाशित










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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 31, 2018 at 12:22pm

आदरणीय त्रिपाठी बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है..बधाई..मैं कल से आपका एक गीत गुनगुना रहा हूँ.."पल दो पल के मीत वेदना क्या समझेंगे"

बहुत ही संवेदन भावों से परिपूर्ण गीत है।

Comment by राज़ नवादवी on October 30, 2018 at 8:42am

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी, आदाब, अभी ग़ज़ल पोस्ट नहीं की है. करने पे बताऊंगा. एफबी का लिंक भेजने का शुक्रिया, रिक्वेस्ट भेज दी है, कृपया देख लें. सादर. 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 30, 2018 at 5:03am

आ. भाई नवीन जी, अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 30, 2018 at 2:06am

आ0 राज नावादवी साहब आपकी ग़ज़ल खोजा पर मिली नहीं । सम्भवतः अभी आपने पोस्ट नहीं की है । 

कृपया आप यहां भी भेज सकते हैं 

https://www.facebook.com/naveen.tripathi.161

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 30, 2018 at 1:53am

आ0 विवेक राज साहब हार्दिक आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 30, 2018 at 1:53am

आ0 बलराम भास्कर साहव हार्दिक आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 30, 2018 at 1:52am

आ0 राज नावादवी साहब तहे दिल से शुक्रिया । बह्र पर ग़ज़ल लिखने के लिए शुक्रिया । आ रहा हूँ आपकी ग़ज़ल पर ।

Comment by Balram Dhakar on October 29, 2018 at 8:45pm

आदरणीय नवीन जी, बहुत खूबसूरत गजल हुई है शेर दर शेर दाद के साथ मुबारकबाद कुबूल फ़रमाएं।

सादर

Comment by Vivek Raj on October 29, 2018 at 7:41pm

आदरणीय नवीन जी.सुन्दर ग़ज़ल के लिये बधाई स्वीकार करें

Comment by राज़ नवादवी on October 29, 2018 at 6:51pm

आदरणीय नवीन मणि जी, आदाब, ग़ज़ल पे मैं अपनी प्रतिक्रिया पहले डे चुका हूँ. आपकी ग़ज़ल के मिसरे "हम देखते ही रह गए दिल का मकाँ  जलता हुआ" से प्रेरित होकर मैंने भी एक ग़ज़ल लिखी है हालांकि इसका काफिया मैंने मकाँ, धुंआ, इत्यादि रक्खा है, बाद में पेश करता हूँ. सादर. 

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