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ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (वो मेरे साथ था, मेरा शिकार होने तक)

1212, 1122, 1212, 22

अजीब बात है, दुश्मन से यार होने तक,

वो मेरे साथ था, मेरा शिकार होने तक।

उबलते खौलते सागर से पार होने तक,

ख़ुदा को भूल न पाए ख़ुमार होने तक।

हमें भी कम न थीं ख़ुशफ़हमियां मुहब्बत में,
हमारा दर्द से अव्वल क़रार होने तक।

तुम्हारा ज़ुल्म बढ़ेगा, हमें ख़बर है ये,
तुम्हारे हुस्न का अगला शिकार होने तक।

ख़िज़ाओं के ये दरख़्तों से कहो, ज़ब्त करें,
बचा रखें ये पत्तियाँ बहार होने तक।

हर एक ज़िद से पिघलता हूँ, ग़र्क होता हूँ, 
तुम्हारे सर पे नई ज़िद सवार होने तक।

तमाम उम्र मुझे ये कचोटता ही रहा,

मेरा वजूद मेरे तार-तार होने तक।

~मौलिक/अप्रकाशित।

~बलराम धाकड़ 

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Comment by Balram Dhakar on November 4, 2018 at 5:43pm

ग़ज़ल में आपकी शिरक़त और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया, आदरणीय विजय निकोर जी।

सादर।

Comment by Balram Dhakar on November 4, 2018 at 5:42pm

आपका बहुत बहुत शुक्रिया, आदरणीय अजय तिवारी जी।

सादर।

Comment by Balram Dhakar on November 4, 2018 at 5:41pm

बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय ब्रजेश जी।

सादर।

Comment by vijay nikore on November 4, 2018 at 3:21pm

गज़ल के शिल्प में तो अन्य माहिर हैं, गज़ल के भाव मुझको बहुत अच्छे लगे। बधाई, बलराम जी।

Comment by Ajay Tiwari on November 3, 2018 at 5:46pm

आदरणीय बलराम जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.  

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 3, 2018 at 12:11pm

वाह बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है आदरणीय...

Comment by Balram Dhakar on November 1, 2018 at 3:08pm

आदरणीय समर सर, ग़ज़ल में आपकी शिरक़त और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

आपकी समझाइश और सुझावों के मुताबिक़ सुधार कर लूँगा।

आपका बहुत बहुत आभार, सर।

Comment by Samar kabeer on November 1, 2018 at 11:51am

जनाब बलराम धाकड़ जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बहुत बहुत मुबारकबाद ।

अजीब बात है, दुश्मन से यार होने तक,

वो मेरे साथ था, मेरा शिकार होने तक'

जैसा कि जनाब निलेश जी बता चुके हैं कि इस मतले के दोनों मिसरों में ऐब-ए-तनाफ़ुर है, इस मतले को यूँ कर लें तो ये ऐब निकल सकता है:-

'ये वाक़िआ है कि दुश्मन से यार होने तक

वो मेरे सँग था मेरा शिकार होने तक'

' ख़िज़ाओं के ये दरख़्तों से कहो, ज़ब्त करें,
बचा रखें ये पत्तियाँ बहार होने तक'

सानी मिसरे में सहीह वाक्य है 'बहार आने तक'और सानी मिसरा जनाब निलेश जी बता चुके हैं कि बह्र में नहीं है,इस शैर को यूँ कर सकते हैं:-

'खिज़ां रसीदा दरख़्तो अभी तो ज़ब्त करो

बचा के रक्खो ये पत्ते बहार होने तक'

बाक़ी शुभ शुभ ।

Comment by Balram Dhakar on October 31, 2018 at 10:34pm

Honourable Zid Saheb, Thanks a million for your complement.

Yes, Shikaar is used twice as Kaafiya but there is no boundation, as I think, to use a Kaafiya twice.

With due respect...

Comment by Balram Dhakar on October 31, 2018 at 10:28pm

आदरणीय छोटेलाल जी, प्रोत्साहन के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

सादर।

कृपया ध्यान दे...

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