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221 2121 1221 212

बे-ख़्वाब आँखों में दबे लम्हात से अलग
गुज़री है ज़िन्दगानी अलामात से अलग

दस्तार रह गई है रवाजों के दरमियाँ
पर इश्क़ खो गया है रिवायात से अलग

जीने की चाह में हुआ बंजारा आदमी
बस घूमता दिखे है मक़ामात से अलग

किस रिश्ते की दुहाई दूँ अहल ए जहाँ को मैं
है क्या यहाँ पे कहिये फ़सादात से अलग

वो वक़्त और ही था कि मौसम बदलते थे
मौसम रहा न अब कोई बरसात से अलग

-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by vijay nikore on November 19, 2018 at 3:30am

इस अच्छी गज़ल के लिए दिल से बधाई, आदरणीय शिज्जू शकूर जी

Comment by राज़ नवादवी on November 18, 2018 at 10:44am

आदरणीय शिज्जू शकूर साहब, सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे बधाई स्वीकार करें. सादर. 

Comment by Ajay Tiwari on November 17, 2018 at 4:26pm

आदरणीय शिज्जु जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 16, 2018 at 7:13pm

आ. भाई शिज्जू जी, सादर अभिवादन । सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by क़मर जौनपुरी on November 15, 2018 at 11:01am
जीने की चाह में हुआ बंजारा आदमी
बस घूमता दिखे है मक़ामात से अलग।

उम्दा शेर के साथ अच्छी ग़ज़ल। मुबारकबाद।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 13, 2018 at 8:49pm

आ. संतोष खिरवडकर जी आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 13, 2018 at 8:48pm

आ. राज नवादवी जी बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 13, 2018 at 8:47pm

आ. तेजवीर सिंह सर हौसलाअफ़्जाई के लिए आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 13, 2018 at 8:46pm

बहुत शुक्रिया मोह्तरम जनाब समर कबीर साहिब

Comment by santosh khirwadkar on November 13, 2018 at 12:54pm

आ. श्री शिज्जु शकूर साहिब नमस्कार , बेहतरीन ग़ज़ल हुई...... बधाई!

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