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इस दर्पण में ......

इस दर्पण में ......

नहीं
मैं नहीं देखना चाहता
स्वयं का ये रूप
इस दर्पण में

नहीं देखना चाहता
स्वयं को इतना बड़ा होता
इस दर्पण में

मैं
सिर्फ और सिर्फ
देखना चाहता हूँ
अपना स्वच्छंद बचपन
इस दर्पण में

गूंजती हैं
मेरे कानों में
आज तक
माँ की लोरियाँ
ज़रा सी चोट पर
उसकी आँखों में
अश्रुधार
मेरी भूख पर
उसके दूध में लिपटा
उसका
स्निग्ध दुलार
कहाँ कुचल सका है
कल का पहिया
स्मृतियों में
जीवित बचपन को
हाँ
मैं वही देखना चाहता हूँ
इस दर्पण में

बारिशों में खेलना
दोस्तों से बतियाना
भयमुक्त शैतानियाँ
बन गयीं हैं
स्मृतियों की अनमोल धरोहर
बता ए दर्पण
तुझे कैसे खेलने दूँ
बचपन की
इन अनमोल स्मृतियों से
तू नहीं जानता
मैं आज भी
अपनी
माँ की गोद में सोता हूँ
जब भी
अकेला होता हूँ
मेरी ज़रा सी भूख पर
वो आज भी व्यथित होती है
मेरे सामने वो हंसती है
मगर
मुँह छुपा कर रोती है
सच
माँ ऐसी ही होती है
मैं
फिर से
वही ममता
वही बचपन
देखना चाहता हूँ
इस दर्पण में

नहीं देखना चाहता
कुछ भी
मैं स्वयं के बचपन को छोड़कर
इस दर्पण में

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 132

Comment

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Comment by Sushil Sarna on November 16, 2018 at 5:29pm

आदरणीय नरेंद्र सिंह जी सृजन पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on November 16, 2018 at 5:28pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by narendrasinh chauhan on November 16, 2018 at 4:03pm

खूब सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें

Comment by Samar kabeer on November 16, 2018 at 3:16pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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