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३ क्षणिकाएं :

तृप्त हो गए
चक्षु
पिघला कर
एक पाषाण से बोझ को
हृदय की
स्मृति श्रृंखला से

.......................

मृत्यु
किसी जीवंत स्वप्न का
यथार्थ है
ज़िंदगी
यथार्थ का
आभास है
प्रीत
आभास में निहित
विश्वास है

...............................

कुछ टूटा
कुछ छूटा
प्रीत पथ के
अंतस से
वेदना साकार हुई
बुत बनी आँखों से
अनुत्तरित एकांत
विकलता का पर्याय बना
बीता क्षण
स्मृतिपृष्ठ का
अविनाशी अध्याय बना

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on January 16, 2019 at 5:33pm

आदरणीय Mahendra Kumar जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on January 16, 2019 at 5:33pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का हार्दिक आभार।

Comment by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 11:12am

आदरणीय सुशील सरना जी, आपकी तीनों क्षणिकाएँ उम्दा हैं. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. //विश्वास है// सादर.

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 16, 2019 at 6:15am

आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। तीनों क्षणिकाएँ उत्तम हैं। इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sushil Sarna on January 11, 2019 at 6:51pm

आदo  सुचिसंदीप अग्रवाल जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on January 11, 2019 at 6:50pm

आदरणीय  PHOOL SINGH जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on January 11, 2019 at 6:50pm

आदरणीय  Samar kabeer जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का हार्दिक आभार।

Comment by सुचिसंदीप अग्रवालl on January 11, 2019 at 8:53am

सुशील सरना जी, बहुत ही उम्दा, उत्तम रचना। सृजन हेतु हार्दिक बधाई

Comment by PHOOL SINGH on January 10, 2019 at 12:00pm

"सरना जी" बहुत सूंदर रचना बधाई स्वीकारें

Comment by Samar kabeer on January 9, 2019 at 11:36am

जनाब सुशील सरना जी आदाब,तीनों क्षणिकाएँ उत्तम हैं,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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