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एक सच ...

एक सच
व्यथित रहा
अंतस के अनंत में
एक सच
लीन रहा
मिलन के बसंत में
एक सच
ठहर गया
दृष्टि के दिगंत में
एक सच
प्रकम्पित हुआ
आभासी कंत में
एक सच
बंदी बना
अभिलाषी कंज में
एक सच
शकुंत बना
अवसान के अंत में
एक सच
अदृश्य रहा
जीवन के प्रपंच में
एक सच
शून्य बना
अंत के अनंत में

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित



Views: 446

Comment

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Comment by Sushil Sarna on February 12, 2019 at 7:48pm

आदरणीय  JAWAHAR LAL SINGH   जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on February 12, 2019 at 7:48pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'  जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on February 12, 2019 at 7:47pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब। ... सृजन के भावों को अपनी स्नेहाशीष से अलंकृत करने का दिल से शुक्रिया।

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on February 6, 2019 at 11:04pm

सच तो सच ही होता है. जो भी आप गिनाये हैं बेहतरीन ढंग से ... आदरणीय सुशील सरना जी, बधाई स्वीकार करें!

Comment by नाथ सोनांचली on February 5, 2019 at 5:45pm

आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। बढ़िया कविता लिखी आपने। इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by Samar kabeer on February 5, 2019 at 2:26pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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