For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

तरही ग़ज़ल (मुझको ये भी न था मालूम किधर जाना था)

अपने ही छाँव तले मुझ को गुज़र जाना था 

आग फैली थी हर इक सिम्त मगर जाना था 

 

कितनी रानाइयाँ सज धज थी तेरी महफ़िल में 

बेसरापा मुझे अनजान शहर जाना था

 

है नई रस्म यहाँ हाकिम ए दौरां की यूँ 

नातवां हो के तेरे दर से गुज़र जाना था 

 

राज़ क्या क्या थे निहाँ वक़्त के साये में मगर

छेड़ कर तान वही फिर से बिखर जाना था 

 

बैठ कर शीश महल से जो न देखा तुमने

आग का गोला था जिस को के शरर जाना था 

 

हाल अपना कहीं ग़ैरों से सुना करते हैं 

नाम मेरा जो लिया उसने, ख़बर जाना था 

 

हो चुकी बात सभी फिर भी न बदला कुछ भी 

हैं मेरे शेर नए कुछ तो असर जाना था  

 

घूमता फिरता रहा भीड़ का हिस्सा बनकर  

मुझको ये भी न था मालूम किधर जाना था

 (मौलिक अप्रकाशित )

Views: 651

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Tanweer on March 5, 2019 at 4:56pm

शुक्रिया ब्रजेश जी

Comment by Tanweer on March 5, 2019 at 4:53pm

जनाब समर कबीर साहब. बहुत शुक्रिया

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 4, 2019 at 11:50am

बहुत ही उम्दा ग़ज़ल कही है ज़नाब तनवीर जी..

Comment by Samar kabeer on March 1, 2019 at 6:12pm

आपके बताए भाव आपके अशआर में बयान नहीं हो पा रहे हैं,बहतर ये है कि इन दो अशआर को ग़ज़ल से ख़ारिज कर दें ।

Comment by Tanweer on March 1, 2019 at 6:04pm
ग़ैर को मेरी ख़बर लेने की क्या ज़रूरत पड़ी? कुछ तो बात होगी।वैसे तो वो मेरे गमख़्वाह नही!
मेरे अशआर शायद नए किस्म के हों।और इन का कुछ न कुछ कहीं न कहीं असर हो। वैसे तो बेहिसी का ज़माना है। एन्ड ऑफ हिस्ट्री और न जाने क्या क्या। हिमाक़त समझिये इसे शायद।
Comment by Samar kabeer on March 1, 2019 at 5:31pm

6ठे और 7वें शैर में आप क्या कहना चाहते हैं,इनका भाव(मफ़हूम)बताएं ।

Comment by Tanweer on March 1, 2019 at 5:04pm

बहुत शुक्रिया जनाब समर कबीर साहब,
छठवें और सातवें शेर की इस्लाह के सिलसिले में थोड़ी वज़ाहत और करें तो शायद बात समझने में सहूलत हो।

Comment by Samar kabeer on March 1, 2019 at 4:18pm

जनाब तनवीर जी आदाब,ओबीओ के तरही मिसरे पर ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'अपने ही छाँव तले मुझ को गुज़र जाना था'

इस मिसरे में 'छाँव' शब्द स्त्रीलिंग है,इसलिए 'अपने' की जगह "अपनी" कर लें । 

'बेसरापा मुझे अनजान शहर जाना था'

इस मिसरे में क़ाफ़िया दोष है,सहीह शब्द है "शह्र"और इसका वज़्न 21 होता है,देखियेगा ।

'है नई रस्म यहाँ हाकिम ए दौरां की यूँ '

इस मिसरे में 'यूँ' की जगह "ये" शब्द उचित होगा ।

'हाल अपना कहीं ग़ैरों से सुना करते हैं 

नाम मेरा जो लिया उसने, ख़बर जाना था'

इस शैर का भाव स्पष्ट नहीं है ।

'हो चुकी बात सभी फिर भी न बदला कुछ भी 

हैं मेरे शेर नए कुछ तो असर जाना था'

इस शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है ।

गिरह ठीक है ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15
जगदानन्द झा 'मनु' added 2 discussions to the group मैथिली साहित्य
Aug 10
Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Aug 6

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Aug 3
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service