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समान सवैया या सवाई छंद

इसमें 32 मात्राऐं व 16'16 पर यति तथा अंत में भगण अर्थात् (211) अनिवार्य है।
【इस छंद में नया प्रयोग करने का प्रयास। अंत में भगण की अनिवार्यता के कारण ‘दीर्घ’ मात्रा प्रयुक्त, अन्यथा सम्पूर्ण छंद में लघु वर्ण】
----------------------------------------

झटपट सजधजकर लचक-धचक, डगमग चलकर पथ महकाकर।
तन झटक-मटक नटखट कर-कर, नयनन सयनन मन बहकाकर।।
फिर घट कर गहकर सरपट चल, पनघट पर झट अलि सँग जाकर।
जल भरकर सर पर घट रखकर, पग-पग चलकर खुश घर आकर।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 20, 2019 at 12:54pm

वाह अति सुन्दर आदरणीय सरस रचना..

Comment by Hariom Shrivastava on March 18, 2019 at 11:36am

आदरणीय समर कबीर साहब, आपकी उपस्थिति व उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार।

Comment by Samar kabeer on March 16, 2019 at 7:33am

जनाब हरिओम श्रीवास्तव जी आदाब,अच्छे छन्द लिखे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Hariom Shrivastava on March 14, 2019 at 10:46am

आदरणीया नीलम उपाध्याय जी,आपकी उपस्थिति व उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु तहेदिल से शुक्रिया।

Comment by Neelam Upadhyaya on March 14, 2019 at 10:31am

आदरणीय हरिओम श्रीवास्तव जी, सुन्दर शब्द संयोजन के साथ अच्छी रचना राधाकृष्ण की गोपियों संग होली के प्रसंग की याद दिला रही है। प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

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