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पलकों पे ठहर जाता है - ग़ज़ल

मापनी - 2122, 1122,1122, 22(112)

 

दूर साहिल हो भले, पार उतर जाता है

इश्क में जब भी कोई हद से गुज़र जाता है

 

है तो मुश्किल यहाँ तकदीर बदलना लेकिन    

माँ दुआ दे तो मुकद्दर भी सँवर जाता है  

 

हमसफ़र साथ रहे कोई अगर मंज़िल तक

वक़्त कितना भी कठिन हो वो गुज़र जाता है

 

ये अलग बात कि जालिम है ज़माना ये मगर

दर्द अपनों ने दिया हो तो अखर जाता है

 

इश्क की राह में दुश्वारियाँ हैं रिस्क भी है

लाख समझाया ये दिल है कि उधर जाता है

 

और कुछ भी तो नहीं पास जिसे दूँ तुझको

एक मोती है जो पलकों पे ठहर जाता है

"मौलिक एवं अप्रकाशित "

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2019 at 9:24pm

आदरणीय दिगंबर नासवा जी सादर नमस्कार, हौसलाफजाई के लिए दिली शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2019 at 9:24pm

आदरणीय बृजेश कुमार जी सादर नमस्कार, हौसलाफजाई के लिए दिली शुक्रिया 

Comment by दिगंबर नासवा on April 19, 2019 at 8:10pm

बसंत जी बधाई स्वीकार करें लाजवाब ग़ज़ल के लिए ... 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 19, 2019 at 3:34pm

बड़ी ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है आदरणीय शर्मा जी..बधाई

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2019 at 9:19am

आदरणीय समर कबीर जी सादर नमन स्वीकार करें , आपकी हौसलाअफजाई से रचना सार्थक हुई 

Comment by Samar kabeer on April 16, 2019 at 2:53pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल कही आपने,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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