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अलग अलग कारण- लघुकथा

सुबह का अखबार जैसे खून से सना हुआ था, इतनी वीभत्स खबर छपी थी जिसकी कल्पना करके ही दिमाग सुन्न हो जा रहा था. सामने चाय की प्याली रखी हुई थी लेकिन उसे पीने की इच्छा मर चुकी थी. उसने अपना सर पकड़ा और बिस्तर पर ही निढाल हो गयी.
"क्या हो गया है इस समाज को, अब और कितना नीचे गिरेंगे हम लोग?, उसके मुंह से बुदबुदाहट की शक्ल में आवाज निकली.
कुछ देर बाद कामवाली बाई आयी और उसने देखा कि चाय वैसे ही रखी है तो उसने टोका "मैडम, तबियत ठीक नहीं है क्या? मैं दूसरी चाय बना लाती हूँ और कोई दवा भी ला दूँ क्या?
उसने सर से हाथ हटाया और बाई को देखने लगी. कम उम्र की बाई सुबह सबसे पहले उसके घर ही आती थी और लगभग दोपहर में जाती थी. वापस शाम को आकर फिर रात में ही जाती थी, इसलिए वह उसे उसकी मेहनत से ज्यादा ही पैसा दे देती थी.
"नहीं मैं ठीक हूँ, तू अभी चाय रहने दे, मन नहीं है", उसने उठते हुए कहा.
बाई ने चाय की ट्रे उठायी और जाते जाते बोली "मैडम, आज शाम को नहीं आउंगी, बिटिया का जन्मदिन है".
उसके चेहरे पर मुस्कराहट फ़ैल गयी, बहुत प्यारी बेटी थी बाई की. कभी कभी बाई उसको ले आती थी तो उसके साथ खेलकर उसे काफी अच्छा लगता था. घरपर वह अकेली ही रहती थी, बच्चे विदेश में थे और पति बहुत पहले ही साथ छोड़ गए थे.
"अच्छा यह बता, आज कहाँ लेकर जायेगी उसे", उसने बाई से पूछा.
बाई के चेहरे पर भी मुस्कराहट आ गयी "कहीं नहीं मैडम, उसे पार्क ले जाउंगी और फिर कुछ बाहर ही खिला दूंगी. ज्यादा रात में डर सा लगता है उस तरफ, इसलिए जल्दी ही घर लौट आउंगी".
उसका दिमाग फिर से उस खबर की तरफ चला गया, वह बच्ची भी तो इसकी बेटी की ही उम्र की थी.
"तू एक काम कर, आज बेटी को लेकर यहीं आ जा, उसका जन्मदिन हम साथ साथ मनाएंगे. वैसे भी तू अकेली है आजकल, यहीं रुक जाना", उसने कहा तो बाई थोड़ा चौंकी, पहले वह कभी मैडम के यहाँ रात में बेटी के साथ नहीं रुकी थी.
"एक और बात, आगे से तू अपनी बेटी को दिन में यहीं छोड़कर जाया कर, मेरे साथ रहेगी तो मेरा भी मन लगा रहेगा", उसने बाई से कहा. बाई अंदर से बहुत खुश हुई और वह भी, बस दोनों के कारण अलग अलग थे.


मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on June 12, 2019 at 4:32pm

इस उत्साह बढ़ाने वाली टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ नीलम उपाध्याय जी

Comment by Neelam Upadhyaya on June 12, 2019 at 2:59pm

आदरणीय विनय कुमार जी, अच्छी संदेशपरक रचना की प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें ।

Comment by विनय कुमार on June 11, 2019 at 3:49pm

इस उत्साह बढ़ाने वाली टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ मुहतरम समर कबीर साहब

Comment by विनय कुमार on June 11, 2019 at 3:48pm

इस उत्साह बढ़ाने वाली टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ तेज वीर सिंह जी

Comment by विनय कुमार on June 11, 2019 at 3:48pm

इस उत्साह बढ़ाने वाली टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ रचना भाटिया जी

Comment by TEJ VEER SINGH on June 11, 2019 at 12:53pm

हार्दिक बधाई आदरणीय विनय जी। बहुत सुंदर संदेशप्रद लघुकथा ।

Comment by Samar kabeer on June 11, 2019 at 12:32pm

जनाब विनय कुमार जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

मुहतरमा प्रतिभा जी के सुझाव अच्छे हैं ।

Comment by Rachna Bhatia on June 10, 2019 at 7:51pm
हर दिल में उठती चिंता का चित्रण करती अच्छी लघुकथा।
आदरणीय बधाई स्वीकार करें।
Comment by विनय कुमार on June 10, 2019 at 7:16pm

इस विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार आ प्रतिभा पांडे जी, आपके सुझाव अमूल्य हैं. उम्मीद है आप आगे भी ऐसे ही मार्गदर्शन करती रहेंगी, शुक्रिया

Comment by pratibha pande on June 10, 2019 at 8:19am

समस्या पर चिंतन और समाधान की कोशिश करती हुई एक अच्छी सकारात्मक रचना के लिये बधाई आपको। ऐसी कई समस्याएँ  हैं जिनका हर जागरूक नागरिक अपने स्तर पर कुछ समाधान ढूँढ सकता है पर हम अक्सर बस चिन्ता दिखा कर अपना फर्ज पूरा कर लेते हैं। शिल्प स्तर पर अ आप कथा का आरंभ बाई के आगमन और गर्म चाय बना लाने की पेशकश से कर सकते हैं। बाई के अपनी बेटी का जिक्र करने के बाद मेडम के दिमाग मे चल रही चिंताओं को शाब्दिक किया जा सकता है। 

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