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संबंधों का जाल

अचानक अजीब मनोदशा

अँधेरी हो रही हैं धुँधली आँखें

कुछ नहीं जानता मैं अब भँवर में

कुछ भी नहीं पहचानता हूँ अंत में

यह निसत्बध्ता, यह काया

एकाकार हो रहे हैं  क्या ?

 

साथ बंधी आ रही हैं  कभी  की

रात देर तक करी हमारी बातें

समुद्र की लहर-सी छलकती

अमृत के झरनों-सी हम दोनों की हँसी

आँखों में  ठहरे कभी के अनुच्चरित प्रश्न

पल में तुम्हारा परिचित चिंता में डूब जाना

उफ़्फ़.. इतने वर्षों के बाद भी वही है  कैसे

हमारी धधकती हुई  गहन वेदना की उष्मा ?

 

भीतर गुहाओं में कोई गहरी गर्जन

घूम-फिर कर आ जाते थे भारी सवाल

बह जाता था तुम्हारी आँखों से अंजन

अख़बार  में  पढ़ते  कोई  गंभीर खबर

अचानक  तुम चुप,  मैं चुप

कुलबुलाता शून्य  भी अप्राकृतिक-सा

सिसकारी भरती गहरी उदासी की छाया

कमरे की हवा का रुख बदलती

ओठों को भींच निज पीड़ा को ठेलती

तू कैसे कह लेती थी ऐसे में  भी

"आओ, चाय तैयार है"

 

आँखों में तिरता एकान्त-पाताल

स्वर में जीवन-यथार्थ की कम्पन

गालों  पर  बूँद-बूँद पिघलते, लुप्त होते

सहसा  सरकते-सिहरते तुम्हारे आँसू

हाथ में हाथ कि जैसे शेष सब समाप्त

हथेलियों पर विरुद्ध-विपरीत

रेंगती पटरियों-सी

आड़ी-टेढ़ी जुड़ती-कटती रेखाएँ

 

हाय ...

चेतना  के  छोर  पर

मानो  मौत  को  भी  पछाड़ता                                

कैसा था यह संबंधों का जाल ?

             --------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on August 22, 2019 at 5:14pm

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई समर कबीर जी

Comment by Samar kabeer on August 16, 2019 at 11:31am

प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब,बहुत ख़ूब वाह, इस बहतरीन प्रस्तुति पर मेरी बधाई स्वीकार करें ।

Comment by vijay nikore on August 11, 2019 at 12:18am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय मित्र तेजवीर सिंह जी

Comment by vijay nikore on August 11, 2019 at 12:18am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय मित्र सुशील जी

Comment by vijay nikore on August 11, 2019 at 12:17am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई गोपाल नारायन जी।

Comment by TEJ VEER SINGH on August 10, 2019 at 6:17pm

हार्दिक बधाई आदरणीय विजय निकोरे जी।लाज़वाब प्रस्तुति।

Comment by Sushil Sarna on August 10, 2019 at 5:38pm

कैसा था यह संबंधों का जाल ?वाह आदरणीय वेदना की ऐसी अनुभूति को आप कैसे शब्दों में चित्रित कर लेते हैं , आपकी कल्पना यथार्थ के पृष्ठों से निकलती प्रतीत होती है। दिल से बधाई स्वीकार आदरणीय निकोर साहिब।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 9, 2019 at 10:38am

अनिवर्चनीय दादा निकोर जी  i अतीत का स्मरण चिंतन इससे अच्छा क्या हो सकता है  I 

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