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आँखों देखी 7 – बर्फ़ की गहरी खाई में

                                                      आँखों देखी 7 – बर्फ़ की गहरी खाई में 
         दक्षिण गंगोत्री स्टेशन के अंदर रहते हुए एक डरावना ख़्याल हम सबको अक़्सर परेशान करता था. हम सभी जानते थे कि पूरा स्टेशन लकड़ी (प्लाईवुड) से बना है और इनसुलेशन के लिये दीवारों के दो पर्तों के बीच पी.यू.फोम भरा हुआ है जो ज्वलनशील पदार्थ होता है. यदि किसी कारणवश स्टेशन के अंदर आग लगी तो चिमनीनुमा एकमात्र प्रवेश/निकास मार्ग से होकर बाहर निकलना शायद असम्भव हो जाए. यदि बाहर निकल भी आए तो ठण्ड से जम जाने के कारण मौत को गले लगाना पड़ेगा.
        मुझे नहीं मालूम कि भारत सरकार से इस बारे में कोई दिशा-निर्देश आया था या नहीं लेकिन एक दिन दलनेता और वरिष्ठ सदस्यों ने सभा बुलाकर सबको सचेत किया कि स्टेशन को हर हालत में आग से बचाना होगा. आग लगने की स्थिति में उससे निबटने के लिये हम लोगों को नियमित रूप से अग्नि-निरोधक उपायों यथा fire extinguisher आदि के उपयोग से परिचित कराया जाता था. ऐसी दुर्घटना यदि घट ही जाए तो क्या करना उचित होगा और क्या नहीं इस बारे में अभियान के शुरु से ही हमें शिक्षित किया जा रहा था. लेकिन यह पहला मौका था कि उस बन्द और छोटे से स्टेशन के अंदर हमें आग लगने की अवस्था में अपनी असहायता का अहसास होने लगा. सभा में इस विषय पर विस्तार से चर्चा हुई कि यदि दुर्घटना घट ही गयी तो हम क्या करेंगे. एक महत्वपूर्ण निर्णय यह लिया गया था कि ऐसी हालत में हम स्टेशन के मुख्य भवन से लगभग दो सौ मीटर की दूरी पर स्थित गैराज में आश्रय लेंगे जहाँ हमारी गाड़ियाँ (polar vehicles) और स्नो-स्कूटर आदि रखे गये थे. किसी काल्पनिक लेकिन संभाव्य आपदा से जूझने के लिये गैराज के अंदर बेतार संचार व्यवस्था, टेलीफ़ोन और भोजन की व्यवस्था सुनिश्चित की गयी. साथ ही आपातकालीन व्यवहार हेतु कुछ अंटार्कटिक सूट, कपड़े और आवश्यक दवाओं का भण्डार बनाया गया.
        इस तैयारी के बाद आवश्यक था कि गैराज में दो-चार रात रुककर देख लिया जाये कि कैसी समस्याओं का सामना हमें करना पड़ सकता है क्योंकि उसके अंदर मुख्य स्टेशन भवन की तरह न पानी की व्यवस्था थी और न ही हीटर की. गैराज भी पूरी तरह बर्फ़ में धँसा हुआ था. अत: यह तय हुआ कि तीन-चार सदस्यों को मिलाकर लगभग चार छोटे-छोटे दल बनाये जायेंगे जो बारी-बारी से गैराज में रात बिताएँगे. सभी के अनुभव और सुझाव के आधार पर किसी भी आकस्मिक परिस्थिति में गैराज में हम लोगों के रहने की क्या न्यूनतम व्यवस्था होनी चाहिये, इस विषय पर अंतिम निर्णय लिया जायेगा.
        इतने दिनों बाद मुझे स्पष्ट याद नहीं कि दलनेता ने पहली टोली को भेजने के लिये कोई दिन निर्धारित किया था या नहीं----सम्भवत: नहीं. बस, एक दिन मौसम अचानक ख़राब हुआ. सभी मशीनी आंकड़े तूफ़ान के एक लम्बे दौर की ओर इशारा कर रहे थे. आदेश हुआ कि पहली टोली उसी शाम (केवल घड़ी के समयानुसार – याद रखना होगा कि उन दिनों दो महीने की रात का समय चल रहा था) गैराज के लिये प्रस्थान करेगी. उस टोली में मैं भी था.
        शाम को जल्दी खाना खाकर हम चार लोग टॉर्च तथा वॉकी-टॉकी से लैस होकर बाहर निकलने को तैयार हुए. मौसम विज्ञान संबंधी प्रयोगशाला में हवा की गति दर्शाते हुए यंत्र की ओर नज़र उठाकर देखा तो चौंकना पड़ा. बाहर 110 किलोमीटर प्रति घंटे के वेग से बर्फ़ का तूफ़ान अर्थात Blizzard चल रहा था. हम लोगों ने एक दूसरे को पर्वतारोहण वाली रस्सी से बाँधा और एक के पीछे एक चिमनीनुमा रास्ते से स्टेशन के बाहर आए. सबसे पहले निकलने वाले भारतीय सेना के एक अधिकारी थे. फिर वैज्ञानिक संस्था से हम दो लोग और अंत में भारतीय नौसेना के एक संचार सेवा अधिकारी. मुझे याद है, जैसे ही मैंने स्टेशन के बाहर क़दम रखा, तेज़ हवा ने मुझे ज़मीन से उठाकर पटक दिया और एक सेकंड से भी कम समय में बर्फ़ के लाखों नुकीले कण मेरे अंटार्कटिक सूट के अंदर घुस गये. मेरा स्नो-गॉगल तो ढक ही चुका था, बर्फ़ के कण उसके पीछे मेरे नित्य व्यवहार के चश्मे पर भी छा गये थे. मुँह के ऊपर से मुखौटा (mask) हट जाने के कारण बर्फ़ मेरे चेहरे पर भी आक्रमण कर रहा था. लेकिन सबसे तकलीफ़देह बात थी मेरे नाक में बर्फ़ का घुस जाना. मेरा दम घुटने लगा था. जितनी बार उठने की कोशिश करूँ नरम बर्फ़ में पैर धँस जाने की वजह से सीधे खड़ा ही नहीं हो पा रहा था. कुछ पल की ही बात थी. मेरे साथियों ने रस्सी में खिंचाव महसूस करके मुझे तुरंत सहारा दिया. हम लोग स्टेशन के ठीक बाहर थे. मैं बुरी तरह हाँफ रहा था लेकिन सबने मुझे स्टेशन के अंदर वापस न जाने की सलाह देते हुए आगे मिशन पर जाने के लिये प्रोत्साहित किया. कोई बात नहीं हुई थी क्योंकि उस भयंकर तूफ़ान के बीच कुछ कहना या किसी को सुनना असम्भव था. केवल इशारे से ही विचारों का आदान-प्रदान हुआ. बहुत नेक सलाह दी थी मेरे बहादुर साथियों ने क्योंकि मेरे या किसी के वापस जाने से दूसरों को नकारात्मक संकेत मिलता जो अभियान के उद्देश्यों के हित में कदापि नहीं होता.
        दक्षिण गंगोत्री स्टेशन से गैराज तक रस्सी पहले ही किसी समय बाँध दी गयी थी. वह तेज़ हवा में एक वक्र (curve) बनाते हुए उड़ रही थी. फलत: अंधेरे और बर्फ़ के कारण हुए white out के सम्मिलित अवस्था में उस रस्सी को ढूँढ़कर पकड़ लेने में हमें थोड़ा समय लग गया. हम सभी लोगों के कपड़े तथा जूतों के अंदर बर्फ़ घुस गया था और तूफ़ान से जूझते हुए हर पल हमारी थकावट बढ़ती जा रही थी. अंतत: कुल दो सौ मीटर की दूरी लगभग एक घंटे में तय करके हम गैराज में पहुँचे. वहाँ सबने कपड़े बदले, बदन सुखाया और गरम चॉकोलेट पीकर अपने को स्वस्थ किया. जब तक हम लोगों के गैराज में पहुँचने की खबर स्टेशन को नहीं मिली थी वहाँ हमारे अन्य सभी साथी बहुत चिंतित थे. ख़ैर....शरीर को कुछ राहत तो अवश्य मिली गैराज के अंदर पहुँचकर लेकिन बेहद ठण्ड (तापमान माईनस 35 डिग्री सेल्सियस) के चलते लगभग बैठे हुए ही हम लोगों ने पहली रात गुज़ारी. धीरे-धीरे शरीर अभ्यस्त होता गया और अगले दिन दोपहर तक विश्वास होने लगा कि लम्बे हैं. आख़िर मुश्किल हालात में इंसान की जिजीविषा स्वत: बढ़ जाती है.
        इस अनुभव ने मेरे जीवन के प्रति दृष्टिकोण को अचानक बहुत परिपक्वता प्रदान किया. मेरी सोच, मेरी कल्पनाएँ प्रकृति के साथ घुलकर नए धरातल पर विचरण करने लगीं और एक, अभी तक अनास्वादित, आनंद की रसधार में मैं बह चला.
        बर्फ़ीले तूफ़ान में फँसकर जो अनुभव हुआ उससे मेरा आत्मविश्वास और मनोबल दोनों बढ़े. उक्त घटना के बाद कुछ ही दिन बीते थे कि एक बार फिर स्टेशन ड्यूटी के समय मुझे नया अनुभव हुआ. इस बार भारतीय सेना के एक सूबेदार मेजर मेरे साथ ड्यूटी कर रहे थे. रात में हम दोनों जब कूड़े का बैग लेकर बाहर निकले तो हल्की हवा चल रही थी. हमारे मौसमविद साथी सदस्य ने हमें चेतावनी दी थी कि कुछ घंटे में मौसम ख़राब होने वाला था. इसलिये आवश्यक था बाहर का काम जल्दी समाप्त कर हम स्टेशन के अंदर वापस आ जाएँ. हमने सभी कूड़ा एक स्लेज पर रखा और उसे खींचते हुए कूड़ा डालने के लिये निर्दिष्ट स्थान पर ले गये. वहाँ हमने कूड़ा गड्ढे में नहीं गिराया और स्लेज सहित वहीं छोड़ दिया. ऐसा करना पड़ा क्योंकि स्लेज को लेकर हवा की विपरीत दिशा में चलना बहुत मुश्किल का काम था और हमें स्टेशन वापस जाने के लिये हवा के विरुद्ध ही जाना था. यदि स्लेज खाली कर दिया गया होता तो उसके उड़कर बहुत दूर चले जाने का अंदेशा था. हमने स्लेज के ऊपर से एक ice axe उठाया और बिना समय गवाँए वापस मुड़ लिये. हालांकि स्टेशन क़रीब 400 मीटर की दूरी पर साफ़ नज़र आ रहा था, हम लोगों के अब तक के अनुभव ने इतना सिखा ही दिया था कि मौसम की चेतावनी को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिये. अब तक हवा का रूख बदल गया था और बर्फ़ का पाऊडर ज़मीन से ऊपर उठने लगा था. हम दोनों ने कसकर एक दूसरे का हाथ पकड़ा और लगभग 50 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार से चलने वाली हवा को अपने चेहरे और सीने पर लेकर स्टेशन की ओर चलने लगे. हमें स्टेशन का छत अभी भी दिख रहा था लेकिन सतह से क़रीब ढाई-तीन फुट की ऊँचाई तक बर्फ़ का पाऊडर उड़ने के कारण कहाँ हम पैर रख रहे हैं इसका कोई आभास नहीं था. अंटार्कटिका के निर्जन, सपाट बर्फ़ीली सतह पर जिसके लगभग 500 फ़ीट नीचे समुद्र मचल रहा था, हम नि:संकोच और निर्भय होकर जितना हो सके तेज़ गति से अपने आशियाने की ओर बढ़ रहे थे जिससे कि स्टेशन हमारी दृष्टि से ओझल होने से पहले हम वहाँ पहुँच जाएँ. जल्दी से जाने की आकुलता में हम भूल गये थे कि जहाँ स्टेशन का जेनरेटर ब्लॉक था उसके पश्चिम की ओर बर्फ़ में एक बड़ा गड्ढा था जिसे अच्छे मौसम के समय भी हम बहुत दूर रखकर ही चलते थे. लेकिन उस रात घुटनों के नीचे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. हम कैसे सीधे उसी गड्ढे की ओर चलते चले गये नहीं पता. अचानक जब दोनों उसमें जा गिरे तो ख़्याल आया. वह लगभग 12-13 फ़ीट गहरा था लेकिन बहुत फैला हुआ नहीं था. मोटे सूट से लैस होने के कारण सौभाग्य से विशेष चोट नहीं लगी हममें से किसी को. हमारा हाथ इस झटके से छूट गया था. हमें कुछ पल लगे अपने को सँभालने में. फिर समझ आया कि हम कहाँ गिरे हैं. हम दोनों ने पर्वातारोहण की शिक्षा पायी हुई थी जो उस घड़ी काम आयी. हाथ से छूटा हुआ ice axe उठाया गया और सख़्त बर्फ़ की दीवार पर बारी-बारी प्रहार करते हुए हमने सीढ़ी बनायी. एक घंटे के कठोर परिश्रम के बाद हम गड्ढे से बाहर निकले. तूफ़ान तेज़ हो गया था लेकिन हम स्टेशन के नज़दीक थे और हमें वहाँ के बाहर की लाईट साफ़ दिख रही थी. थककर चूर लेकिन आत्मविश्वास से भरपूर लड़खड़ाते क़दमों से जब स्टेशन के अंदर पहुँचे तो शायद ही किसी को आभास था कि हमारे ऊपर अभी-अभी क्या बीती थी.
        फिर मौसम ऐसा ख़राब हुआ कि तीन-चार दिन तक हम स्टेशन से बाहर ही नहीं निकल पाये. स्टेशन के बाहर और अंदर अंटार्कटिका नित्य नए रूप में अपना अपार सौंदर्य और रहस्य लेकर हमारे सामने प्रकट हो रहा था.

 

(मौलिक तथा अप्रकाशित सत्य घटना)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on December 29, 2013 at 1:25am

वीनस जी,

आपकी अनोखी प्रतिक्रिया के लिये हार्दिक आभार.

Comment by Shubhranshu Pandey on December 28, 2013 at 9:43am

मैदानी इलाकों में बैठे बैठे अंटार्कटिका के ठंढ की चुनौतियों का सामना करने का अहसास हो रहा है.

अमुमन किसी यात्रा संस्मरण को पढते समय ऎसा लगता है कि शायद वहाँ जाया जा सकता है. और उसे देखना है. लेकिन आपके संस्मरण और यात्रा वॄतांत के शब्द ही हमारे लिये टिकट और वीसा है. और सबसे बडी़ बात ये है कि शब्दों के प्रवाह ने आपकी हर कठिनाइयों को इतने साफ़ तरीके से पाठक के सामने रखा है कि कई बार सौरभ जी के शब्दों में //कि मुझे कई बार बैठे-बैठे गोद में बर्फ़ के अनगिन ग्रैन्युल्स का आभास हुआ ! और, हाथ उन्हें झाड़ कर हटाने के लिए एकबारग़ी उद्यत हो गये//  ये एक पाठक नहीं वरन् हर पाठक आपके साथ शायद गड्ढे में जाने के बाद कुल्हाडी़ के लिये हाथ मार रहा होगा. 

सादर.

Comment by बृजेश नीरज on December 27, 2013 at 8:26pm

बिना खर्चे के एक अनूठे अनुभव की प्राप्ति होती गयी!

हम सबका सौभाग्य है कि आपका सानिध्य हम सबको प्राप्त हुआ!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 27, 2013 at 7:22pm

क्या बात है !
जीवन के व्यतीत हो रहे पलों को ढोने और उन्हें जीने में जो अंतर हुआ करता है, उसकी सुन्दर बानग़ी है संस्मरण की ये कड़ियाँ !

कथ्य में मानवीय जिजीविषा का अन्यतम रूप निखर कर आया है.

प्रस्तुति का प्रवाह, संस्मरण में अंतर्निहित उत्सुकता के पल, साहचर्य-क्रियान्वयन का असीम अनुभव और किसी उन्नत मिशन के एक उत्तरदायी भागीदार के रूप में दायित्व-निर्वहन की प्रक्रिया का बहुत ही सार्थक और सजीव वर्णन हुआ है. ऐसा, कि मुझे कई बार बैठे-बैठे गोद में बर्फ़ के अनगिन ग्रैन्युल्स का आभास हुआ ! और, हाथ उन्हें झाड़ कर हटाने के लिए एकबारग़ी उद्यत हो गये ! .. ओह, अद्भुत !

गहन कठिनाइयाँ सदस्यों को जोड़ती तो हैं ही, जीवन के प्रति दृष्टि को भी प्रभावित करती हैं.

अंटार्कटिका का बेधता हुआ विजन, हिमालय की अदम्य दृढ़ता और उसकी ऊँचाई, महासागरों का असीमवत विस्तार और उनकी गहराई, सहारा की महाघोर शुष्कता ईश-प्रभावी संवेदनशीलता को अनुभूतियों के अव्यक्त आयाम से परिचित कराती हैं. और, अनुभूत व्यक्तित्त्व में निर्लिप्तता की दशा की सकारात्मकता का प्राकट्य संभव हो पाता है.

आपके प्रस्तुतीकरण के प्रति मैं नत हूँ, आदरणीय. तथा, आपके व्यावहारिक सम्मोहन से कुछ और बँधा.

आदरणीय शरदिन्दुजी, आप जिस निमग्नता से इस लेख की कड़ियों को प्रस्तुत कर रहे हैं वह इस मंच के सभी पाठकों के लिए गर्व का विषय है.

यह अवश्य है कि कथ्य प्रस्तुतीकरण के क्रम में व्याकरणीय अशुद्धियाँ बनी रह गयी हैं जिनका न होना इस उच्च प्रस्तुति की शब्ददशा की मांग है. किन्तु, यह भी सत्य है कि जिस बहाव के साथ यह लेख वातावरण का निर्माण करता है उसम्ं इन पर अधिक ध्यान नहीं जा पाता.

सादर बधाइयाँ और शुभकामनाएँ

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 27, 2013 at 12:45pm

आदरणीय शारदेन्दु जी', प्रणाम i

अप्रतिम वर्णन है i पाठक मानो सहयात्री बनकर आपकी यात्रा में शामिल हो जाता है i रोमांच के साथ अघटित की संभावनाओ के रहस्य --पग पग पर नई जिज्ञासा की तलाश करते से लगते है i  बधाई हो i हम जिज्ञासुओ को पूरा घटनाक्रम पुस्तक के रूप में पढने की आकुल प्रतीक्षा रहेगी i  साधुवाद ----i आपकी लेखनी को नमस्कार i

Comment by S. C. Brahmachari on December 26, 2013 at 5:40pm
मेरा विश्वास है कि " आंखो देखी " के सारे अनुभव संस्मरण पूर्णता के उपरान्त एक पुस्तक के रूप मे प्रकाशित होगी और बेस्ट डेलर साबित होगी । डॉ0 मुखर्जी , अद्भुत प्रस्तुतिकरण के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 25, 2013 at 10:26pm

आदरणीय शरदिंदु  भाई , अंटार्कटिका के सुन्दर , रोमांचक , लोम हर्षक  संस्मरण के लिये आपको बधाई , और कल्पना मे हमे भी वहाँ ले जाने के लिये आपको बहुत धन्यवाद , आभार ॥

Comment by MAHIMA SHREE on December 25, 2013 at 9:51pm

आदरणीय शरदेन्दु सर .. गजब के अनुभव और कितना सुंदर वर्णन ... वाकई में आपके अदभुत अनुभव को हमने भी आँखों  देखी सा ही पढ़ के जिया ..हार्दिक आभार .. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 25, 2013 at 9:50pm

आदरणीय शरदिंदु सर, अंटार्कटिका के आपके सारे अनुभव वाकई रोमांचित करने वाले हैं और आपके संस्मरण पढ़के लगता है
''है दिलकश जितनी ये दुनिया यारो
 उतना हैबतनाक नज़ारा इसका''

Comment by Ashok Kumar Raktale on December 25, 2013 at 9:40pm

आदरणीय शरदिंदु जी सादर, अंटार्कटिका की पल-पल रोमांचित कर देने वाली घटनाओं के बारे में आप से सुनकर कुछ सिहरन सी जरूर होती है मगर लगता है कभी वहां जाने का अवसर मिलना चाहिए. आपके अनुभव और यादों के पिटारे से निकले इस सुन्दर वृत्तांत के लिए सादर आभार.

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