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ये मोहब्बत भी क्या चीज़ होती है -- डॉo विजय शंकर

हर बात की वजह होती है
ये मोहब्बत ही क्यों बेवजह होती है
और जो बवजह हो , वो कुछ भी हो ,
यक़ीनन, वो मोहब्बत नहीं होती है ॥

जानकार कहते हैं ,
बिना हिलाये तो पता भी नहीं हिलता ,
बिना किये तो कुछ भी नहीं होता है ,
फिर ये मोहब्बत क्यूँकर अपने आप होती है ।

यूँ तो बहुत जगाये रहती है , फिर भी ,
ये मोहब्बत क्यों एक गहरी नींद का ,
एक ख़्वाब सी लगती है जो हमेशा
टूट जाने के डर के साये में रहती है ॥

मोहब्बत कोई गुनाह तो नहीं है , नहीं है न।
जो करते हो और सजा पाते हो ,
पाते रहते हो , और सहते जाते हो ॥

मोहब्बत को कितना भी सहेज के रखो ,
कितना भी जमाने से बचा के रखो ,
पर इसे नज़र लग ही जाती है ॥
बहुत जल्दी लग जाती है ॥
बेहतर है इसे दिल में रखो , आँखों में रखो,
लोगों से बचा के रखो ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on December 10, 2014 at 9:50pm
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय गिरिराज भंडारी जी , आपको प्रस्तुति पसंद आई , इसी से मेरा मनोबल बढ़ता है। सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 10, 2014 at 8:00pm

आदरणीय विजय भाई ,मुहब्बत पर बहुत सुन्दर तार्किक अभिव्यक्ति के लिये बधाई !

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 9, 2014 at 7:51pm
सुन्दर भावाव्यक्ति के लिए बहुत बहुत धन्यवाद , आदरणीय गुमनाम पिथौरागढ़ी जी।
Comment by Dr. Vijai Shanker on December 9, 2014 at 7:49pm
आपको रचना पसंद आई, बहुत बहुत धन्यवाद , आदरणीय राहुल डांगी जी।
Comment by Dr. Vijai Shanker on December 9, 2014 at 7:46pm
आपको पसंद आई, काव्यरचना सार्थक हुई , आदरणीय योगराज प्रभाकर जी , आपकी बधाई हेतु ह्रदय से आभार , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on December 9, 2014 at 7:43pm
सही कहा आपने आदरणीय सोमेश कुमार जी , प्यार को सीमाओं, शर्तों में बाँध कर परिभाषित नहीं किया जा सकता है। आपके सुरुचि पूर्ण विचार प्रस्तुति हेतु सादर धन्यवाद।
Comment by gumnaam pithoragarhi on December 9, 2014 at 6:41pm

वाह सर बहुत खूब ...........

Comment by Rahul Dangi Panchal on December 9, 2014 at 2:59pm
वाह बहुत सुन्दर बधाई हो

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 9, 2014 at 11:40am

अच्छी काव्याभ्यक्ति है डॉ विजय शंकर जी, बधाई प्रेषित है।

Comment by somesh kumar on December 9, 2014 at 10:12am

शर्तों में बंधकर करूं वो प्यार स्वीकार नहीं 

ये तो पक्की सौदेबाजी सौदेबाजी प्यार नहीं 

प्यार तो एक बादल की तरह है जो बरबस ही उमड़ पड़ता है और अपने अहसास में भिगो लेता है  हर आने वाली जमीन को /जहाँ ये प्यास बुझाने लगे ,जरूरत बन जाए वहाँ बस प्यार ही प्यार रहता है 

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