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घर वो होता है -- डॉo विजय शंकर

घर वो होता है ,
जहां आपका सदैव
इन्तजार होता है ।
जहां आप जाते नहीं ,
आप , जहां भी जाते हैं ,
वहीँ से जाते हैं ।
घर न दूर होता है , न पास होता है ,
जहां से हम सारी दूरियां नापते हैं ,
घर वो होता है ।
घर वो होता है,
जहां माँ होती है ,
जहां से माँ आपको कहीं भी भेजे ,
आपका इन्तजार वहीँ करती होती है ।
माँ जननी होती है , जनम देती है ,
धरती पर लाती है , माँ घर बनाती है ,
माँ ही घर देती है ,जब तक माँ होती है ,
अपने सब बच्चों को ,
बांधे रहती है, जोड़े रहती है,
घर को बिखरने से रोके रहती है |
घर वो होता है ,
एक बार जो घर छूट जाये ,
एक बार जो घर टूट जाये ,
तो वो घर , फिर कहीं नहीं होता है ॥
बस , मन में होता है ,
दिल में होता है ,
यादों में होता है ,
पर हमेशा होता हैं ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on December 13, 2014 at 11:21am
रचना को स्वीकार करने हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय विजय प्रकाश शर्मा जी, बधाई हेतु सादर धन्यवाद।
Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on December 13, 2014 at 9:33am

आधुनिकता के प्रभाव में टूटते घर मात्र मकान बनकर रह गए हैं, घर को पुनर्परिभाषित करने पर बहुत बधाई आदरणीय डॉ, विजय शंकर जी.

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 12, 2014 at 7:49pm
रचना को पसंद करने के लिए ह्रदय से धन्यवाद आदरणीय लक्ष्मण धामी जी , सादर।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2014 at 12:10pm

घर वो होता हैए
जहां माँ होती है ए
जहां से माँ आपको कहीं भी भेजे ए
आपका इन्तजार वहीँ करती होती है ।
माँ जननी होती है ए जनम देती है ए
धरती पर लाती है ए माँ घर बनाती है ए
माँ ही घर देती है एजब तक माँ होती है ए
बहुत सही कहा आपने आदरणीय भाई विजय जी घर वही होता है जहां मां का वास हो ममता भरा वातावरण हो ।सच कहा है आपने मां चाहे खुद टूट बिखर जाए पर घर को टूटने बिखरने नहीं देती । घर के बहाने मां की महिमा का बखान करने के लिए हार्दिक बधाई ।

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 12, 2014 at 4:09am
रचना की प्रशस्ति के लिए आपका ह्रदय से आभार आदरणीय शिज्जु शकूर जी , धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on December 12, 2014 at 4:05am
रचना के भावों ने आपको मोह लिया , अच्छा लगा जानकर ॥ आपने उन्हीं भावों को जो नवीन शब्दों से एक नया रूप दिया है उसने उनका मान और बढ़ा दिया है , आपका ह्रदय से आभार आदरणीय मिथिलेश कुमार जी , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on December 12, 2014 at 3:57am
आदरणीय मीणा पाठक जी , आपने प्रस्तुति को पसंद कर बड़ा मान दिया है , आभार , बधाई के लिए ह्रदय से धन्यवाद , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 11, 2014 at 9:29pm

बहुत खूब आदरणीय विजय सर बहुत बहुत बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 11, 2014 at 8:10pm

भाव पूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाई ...

रचना के भावों ने इतना मोह लिया कि खुद को रोक नहीं पाया, सादर-

वही घर है जहाँ पे मुन्तजिर अपने हमेशा है 
जहाँ भी आप जाते है वहीं से आप जाते है

न घर ये दूर होता है न घर ये पास होता है 
जहाँ से दूरियां नापे बड़ा विश्वास होता है

जहाँ होती सभी की माँ वही तो घर बनाती है

जनम देती जमीं पे वो हमे दुनियां सिखाती है 
सभी को बाँध रखती है बिखरने से बचाती है

अगर घर छूट जाए तो

अगर घर टूट जाए तो

मगर घर तो अज़ल से आज तक आबाद होता है 
कभी दिल में कभी मन में हमेशा याद होता है

Comment by Meena Pathak on December 11, 2014 at 6:16pm

घर वो होता है,
जहां माँ होती है ,
जहां से माँ आपको कहीं भी भेजे ,
आपका इन्तजार वहीँ करती होती है ।
माँ जननी होती है , जनम देती है ,
धरती पर लाती है , माँ घर बनाती है ,
माँ ही घर देती है ,जब तक माँ होती है ,
अपने सब बच्चों को ,
बांधे रहती है, जोड़े रहती है,
घर को बिखरने से रोके रहती है |
घर वो होता है ,.........................................सच है ...बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर भावपूर्ण रचना हेतु 

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