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न्यूज़ (लघुकथा) - डॉo विजय शंकर

" अरे यार ये टीo वीo चैनेल वाले भी बस क्या क्या दिखाते रहते हैं , हफ़्तों - महीनों। कभी किसी बाबा को , कभी किसी स्वामिनी को या फिर पारिवारिक रंजिशें।
बस यही देश की न्यूज़ रह गई है ? "
" उनकीं नज़र में यही न्यूज़ है , वो बचपन में पढ़े थे न , कुत्ता आदमी को काटे तो न्यूज़ नहीं होती है , हाँ , आदमी कुत्ते को काटे तो न्यूज़ होती है , किसी बड़े खबरची ने कहा है।"
" पता नहीं , यार , हम तो कभी कुत्ते को काटे नहीं , वो हमारे सामने काट के दिखाता तो पता चलता , उसे भी और हमें भी। "

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on September 3, 2015 at 3:13pm

बहुत ही गहन अर्थ को इंगित करती इस लघु कथा के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय  Dr. Vijai Shanker    जी। 

Comment by TEJ VEER SINGH on September 3, 2015 at 2:40pm

हार्दिक बधाई  आदरणीय  डॉ विजय शंकर जी!लघुकथा के माध्यम से बहुत गहरी और गम्भीर समस्या को उजागर कर दिया आपने!

Comment by pratibha pande on September 3, 2015 at 12:50pm
आदरणीय डॉ विजय शंकर जी ,कथा की अंतिम पंक्ति ने सच में मुग्ध कर दिया ,बार बार पढ़ा है मैंने इसे ,आपको हार्दिक बधाई इस रचना के लिए सादर

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