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जागरूकता -- डॉo विजय शंकर

वह ऑटो से उतरा, पैसे दिए और जल्दी से पीछे हट गया ,उसे डर था कि अभी ऑटो खूब ढेर सा धुंआ उसके सामने उगल कर चला जाएगा , पर ऐसा हुआ नहीं , ऑटो लहरा कर निकल गया, उसने गौर से देखा ऑटो सी एन जी वाला था। चारों तरफ फैले धुएं धुएं से उसे घुटन सी हो रही थी. जेब से कार्ड निकाल कर उसने पास खड़े कुछ एडजूकेटेड लोगों की और बढ़ कर पता पूछा , उन्होंने बड़ी शालीनता से उसी समझाया, वो जो ऊपर पांच चिमनियां देख रहें हैं , वो जिनसे काला काला धुअाँ निकल रहा है, हाँ, वही. उसने सर उठा कर देखा दूर दूर तक आसमान स्लेटी स्लेटी सा हो रहा था.

- वो तो आपकी अल्मुनियम की फैक्ट्री है, अल्मुनियम प्लेट्स बनाते हैं वो, वही जिससे प्रेशर कूकर बनते हैं, जिंदगी आसान, कह कर वह हस दिया।
- वह उसके साइड वाली , वह आपकी स्टील की फैक्ट्री है, यहां से नहीं दिखेगा, पास जाएंगे तो उनका खूब बड़ा सा बोर्ड दिखेगा। वही है.
उसका मन जोर से खांसने को हो रहा था , गला बिलकुल सूख गया था. तभी एक बूढ़ा सा आदमी, शायद कुछ पूछने उनकीं तरफ आ रहा था। उसके हाथ में बीड़ी थी , वह मुँह खोलता उसके पहले वो सज्जन चिल्ला पड़े , बीड़ी उधर, बीड़ी उधर, मेरी जान लोगे क्या भैया , आप लोग , बाज नहीं आते , दिन भर बीड़ी फूंकते हो, अपने साथ साथ दूसरों की जान के भी दुश्मन बने रहते हो , हम से बात करनी है तो बीड़ी उधर फेंक कर आओ.
बीड़ी तो उस बूढ़े ने फेंक दी , पर उनकें पास आने के बजाय दूसरी तरफ निकल गया, वह सोंच रहा था , बीड़ी तो उसके पिताजी, दादा भी पीते थे, पर तब तो कौनों की सांस नहीं फूलत रही, हाँ तब शायद यह इतनी ढेर सारी धुंआ उगलत फैक्टरियां नाहीं रहीं।
वह सज्जन अभी भी बड़बड़ा रहे थे , यार इनके लिए कुछ भी कर दो , ये नहीं सुधरेंगे. बीड़ी जरूर पिएँगे. किसी की जान की फ़िक्र नहीं है इन्हें ।
उधर चिमनियों से बड़ी तेजी से काले धुएं का झोंका निकल रहा था, शायद  भट्टी में कोयला डाला गया था.

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on June 10, 2015 at 6:53pm

आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी,प्रस्तुति पर आपकी स्वीकृति एवं सहमति से बल मिलता है , दिल्ली एवं ऍन सी आर में यह प्रश्न बहुत ही गम्भीर होता जा रहा है, अस्पतालों और डाक्टरों के पास सांस के मरीज बढ़ते ही जा रहे हैं, छोटे-छोटे बच्चे इन्हेलर और नोबेलाइजर ले रहे हैं, सुबह पहने कपड़े कुछ ही देर में रंगत खो देते हैं ………पर इस पर ध्यान किसी का नहीं जाता, पानी की अलग समस्या है , कितने लोग बिसलरी का जल पी सकने की आर्थिक स्थिति में हैं.
मुंशी प्रेमचंद के " ठाकुर का कुआं " की समस्या कुछ दूसरे रूप में आज भी जीवित है. quality of life index में हमारी स्थिति कोई बहुत संतोष जनक नहीं है.
प्रकरण को आपने महत्व दिया, आपका आभार एवं धन्यवाद, सादर।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 9, 2015 at 11:59pm

बिना सही दिशा के और बगैर आम आदमी को विश्वास में लिये या संतुष्ट किये हो रहा कोई विकास कितना दानवी हुआ करता है ! इस तथ्य को इस कथा में आपने संवेदनशीलता के साथ उभारा है, आदरणीय विजय शंकरजी.
इस प्रस्तुति एक् लिए हार्दिक बधाई.
सादर

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 5, 2015 at 8:03pm

आदरणीय वीरेंद्र वीर वर्मा जी, आभार एवं धन्यवाद, सादर। 

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 5, 2015 at 8:01pm

आदरणीय डॉ o आशुतोष मिश्रा जी, आभार एवं धन्यवाद, सादर। 

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 5, 2015 at 8:00pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी, आभार एवं धन्यवाद, सादर। 

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on June 5, 2015 at 6:08pm

आदरणीय  डॉ विजय शंकर जी  बहुत ही सुन्दर  विषय पर असाधारण प्रस्तुति। मेरी और से आपको इस रचना के लिए हार्दिक बधाई!

सच में आज के समाज में हम बड़ी बड़ी कारणों को छोड़ छोटे कारणों को ज्यादा भाव देते है और अपने आपको कुछ अधिक ही जागरूक मानने लगते है. ......   

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 5, 2015 at 1:56pm

आदरणीय विजय सर ..जो खुद करो वो सही है वाकी सब गलत है ..बहुत ही गहन चिंतन की तरफ इशारा करती सन्देश प्रद कहानी के लिए ह्रदय से बधायी सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 5, 2015 at 10:21am

आदरणीय विजय भाई , अच्छी कहानी कही , सच है खुद के कपड़ो के दाग कभी खुद को दिखाई  नही देते । आपको हार्दिक बधाइयाँ 

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 4, 2015 at 8:23pm

आदरणीय मोहन सेठी जी, कहानी पर आपकी सवेदनशील टिप्पणी के लिए आभार,धन्यवाद , सादर।

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on June 4, 2015 at 3:20pm

कहानी अच्छी लगी प्रदूषण तो बढ़ रहा है लेकिन बीडी सिगरेट भी पीने वाले को कैंसर देता है और पैसिव स्मोकिंग से भी यही होता है बहरहाल एक छोटा और एक बड़ा भाई ..... 

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