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अपने धंधे , अपने तरीके हैं --- डॉo विजय शंकर

धंधे को मान देना ,
धंधे की बात है ।
पेशेवर खिलाड़ियों को मान-ईनाम ,
खुद एक पेशे की बात है ।
सैनिक के शहीद होने को
पेशे से जोड़ना दुःख की बात है ।

लोगों को हिफाजत दे नहीं पाते ,
वो हादसे के शिकार हो जाएँ
तो बड़ी बड़ी शोक सभाएं ,
कैंडल-मार्च निकलवाते हैं ,
और किया तो कोई गली
सड़क उसके नाम करवाते हैं।

प्रतिभा को हम तभी जानते हैं
जब दूसरे कोई विदेशी
पहले उसे पहचानते हैं ,
तब बड़े जोश खरोश से हम
उसे अपना अपना चिल्लाते हैं.

पुरोधाओं को सम्मान देने के
हमारे अपने ख़ास तरीके हैं ,
नेत्र-हीन भिखारी को भीख
नहीं देना होता है तो
सूरदास आगे बढ़ो ,कह कर
हम पुरोधा कवि को सम्मान देते हैं ,
उनके प्रति श्रद्धा-सुमन-समर्पण को
हम यूँ प्रदर्शित करते हैं।

मौलिक एवं अप्रकाशित
डॉo विजय शंकर

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Comment by gumnaam pithoragarhi on March 3, 2015 at 8:15pm
आदरणीय डॉo विजय शंकर सर ,रचना के भाव मन को झकझोरते है ,सुन्दर रचना , हार्दिक बधाई आपको ,
Comment by somesh kumar on March 3, 2015 at 7:55pm

कटाक्ष है और बहुत सुंदर है |अलग-अलग पेशेवरों का चित्रण है |खुद को पुरस्कार देना ,जुगाड़-करके पुरस्कार करना .अपना महिमा मंडन करना और दुसरे को हेय समझना यही सब ट हो रहा है |सुंदर और महत्त्वपूर्ण रचना |

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 3, 2015 at 7:51pm
आदरणीय डॉ o गोपाल नारायण जी, रचना आप को पसंद आई, आभार , आपकी सद्भावनाओं के लिए भी आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 3, 2015 at 7:45pm
आदरणीय वीरेंद्र वीर मेहता जी, रचना आप को पसंद आई, सफल हुई , आपकी सद्भावनाओं के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 3, 2015 at 7:14pm

प्रतिभा को हम तभी जानते हैं
जब दूसरे कोई विदेशी
पहले उसे पहचानते हैं ,
तब बड़े जोश खरोश से हम
उसे अपना अपना चिल्लाते हैं.-------विजय सर i -------- बहुत सुन्दर विचार i सादर i  

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on March 3, 2015 at 5:41pm

पुरोधाओं को सम्मान देने के
हमारे अपने ख़ास तरीके हैं ,
नेत्र-हीन भिखारी को भीख
नहीं देना होता है तो
सूरदास आगे बढ़ो ,कह कर
हम पुरोधा कवि को सम्मान देते हैं ,
उनके प्रति श्रद्धा-सुमन-समर्पण को
हम यूँ प्रदर्शित करते हैं।

अति सुन्दर पंक्तिया आदरणीय डॉo विजय शंकर जी ......जीवन के ठोस धरातल पर मनुष्य का ये वयवहार कही न कही मन को जकझोरता  है. 

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 3, 2015 at 5:18pm
रचना आपको पसंद आई, आभार, आदरणीय महर्षि त्रिपाठी जी, सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 3, 2015 at 5:16pm
आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी, रचना के भाव आप तक पहुंचे , सुखद है , आपका आभार, आपकी बधाई एवं सद्भावनाओं के लिए ह्रदय से धन्यवाद , सादर।
Comment by maharshi tripathi on March 3, 2015 at 4:32pm

लोगों को हिफाजत दे नहीं पाते ,
वो हादसे के शिकार हो जाएँ
तो बड़ी बड़ी शोक सभाएं ,
कैंडल-मार्च निकलवाते हैं ,
और किया तो कोई गली
सड़क उसके नाम करवाते हैं।,,,,,,,,,,वाह !! अत्यंत सुन्दर भाव|

Comment by Hari Prakash Dubey on March 3, 2015 at 2:14pm

 आदरणीय डॉo विजय शंकर सर ,रचना के भाव मन को झकझोरते है ,सुन्दर रचना , हार्दिक बधाई आपको , मुझे लगता है शिल्प पर और कार्य हो सकता है ,सादर !

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