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ग़ज़ल : ज़रा  सोचिए दिल लगाने से पहले : SALIM RAZA REWA

122 122 122 122
....

महब्बत  की राहों  में जाने से पहले.

ज़रा  सोचिए  दिल  लगाने से पहले.
.
बहारों का इक शामियाना  बना  दो.
ख़िज़ाओं को गुलशन में आने से पहले.
.
गिरेबान में  झांक  कर अपने देखो.
किसी पर भी उंगली उठाने से पहले.
.
ग़रीबों की आहों से बचना है मुश्क़िल.
ये तुम सोच लो दिल दुखाने से पहले.
.
कभी चल के शोलों पे देखो रज़ा तुम.
महब्बत  की  बस्ती  जलाने से पहले.
..

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ajay Tiwari on October 15, 2017 at 9:20am

आदरणीय सलीम साहब,

अच्छी ग़ज़ल हुई है. शुभकामनाएं .

सादर 

Comment by SALIM RAZA REWA on October 15, 2017 at 7:55am
जनाब आरिफ साहब,
आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया.
Comment by Mohammed Arif on October 15, 2017 at 7:41am
गिरेबान में झांक कर अपने देखो.
किसी पर भी उंगली उठाने से पहले बहुत ही सच्चा शे'र पेश किया है आपने ।
बढ़िया ग़ज़ल के लिए दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
Comment by SALIM RAZA REWA on October 14, 2017 at 8:57pm

आदरणीय काली प्रसाद जी ,
आपकी मुहब्बत सलामत रहे बहुत बहुत शुक्रिया ,

Comment by Kalipad Prasad Mandal on October 14, 2017 at 8:35pm

आ सलीम साहब  बहुत उम्दा ग़ज़ल , बधाई |

Comment by SALIM RAZA REWA on October 14, 2017 at 2:32pm
आ. नीलेश जी बहुत शुक्रिया.
Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 13, 2017 at 6:46pm

आ. सलीम साहब,

अच्छी ग़ज़ल हुई है ..
मतले में शमअ का वज़'न ग़लत ले लिया है आपने  शायद..
अन्य शेर में शामियाना कर लें 
सादर  

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