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सम्भावना के द्वार पर दस्तक हुई है
देखकर मुझको हुई वह छुईमुई है

देखता ही रह गया विस्मित चकित सा
रंग, रस, मद से भरी वह सुरमई है

रम्य मौसम, रम्य ही वातावरण ये 
सुनहली इस साँझ की सज धज नई है

प्रेम की पलपल उमड़ती भावना पर
वर्जनाओं की सतत् चुभती सुई है

तरलता बांधी गयी, कुचली गयी हैं कोपलें
क्रूरता द्वारा सदा सारी हदें लांघी गयी हैं

क्रूरता सहनें को तत्पर, वर्जना मानें ना मन
प्यार का अदभुत् असर हम पर हुआ कुछ जादुई है !

मौलिक व अप्रकाशित ---नन्दकिशोर दुबे 

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Comment by Samar kabeer on September 25, 2017 at 10:53am
जनाब नन्दकिशोर जी आदाब,अगर ये ग़ज़ल है तो आपको इसके साथ अरकान लिखना चाहिए जो मंच का नियम भी है, ताकि रचना पर कुछ कहने में पाठकों को आसानी हो ।
प्रयास अच्छा है बधाई स्वीकार करें ,जनाब बसंत जी से सहमत हूँ ।
Comment by नन्दकिशोर दुबे on September 24, 2017 at 10:55am
मैंने तो गाकर ही लिखी है / फिर भी और देखता हूँ/आपका आभार महानुभाव ।ऐसा सहयोग बनाये रखे /रचना प्रवाह जब आता है /तो आप बता रही है वैसा निश्चय ही हो सकता है /रचना आपके ध्यानाकर्षण से और निखरेगी ही पुनः आभार बन्धु ।
Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 24, 2017 at 10:18am

बेहतरीन भाव , वाह , आनन्द आ गया आदरणीय 

सम्भावना के द्वार पर दस्तक हुई है
देखकर मुझको हुई वह छुईमुई है .....अप्रतिम 

दो पदों में तुकांत कुछ गड़बड़ा रहा है.

Comment by Rohit Dubey "योद्धा " on September 23, 2017 at 3:41pm

बहुत सुन्दर सरस और सारगर्भित रचना ..हार्दिक बधाई

कृपया ध्यान दे...

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