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"ओबीओ लाइव महा-उत्सव" अंक ८ में सम्मिलित सभी रचनाएँ

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सारी रचनाएँ एक ही जगह पढ़ने को मिल गईं। योगराज जी का इस श्रम साध्य कार्य के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

आदरणीय प्रधान संपादक जी, ओ बी ओ के नए सदस्य जनाब इमरान खान ने कल रात्रि १०.५८   पर यह पोस्ट मुझे इ मेल पर भेजा था किन्तु किसी कारण वश यह स्पैम मेल में चला गया था और मैं देख न सका , फलस्वरूप "महा उत्सव" में शामिल न हो सका, अनुरोध है की कृपया इसे भी इस पोस्ट में शामिल कर ले |

 

ये गीत मुझको ही गुनगुनाने नहीं आते,
हाँ मुझे ही रिश्ते निभाने नहीं आते

प्यारी ज़मी को मैंने सींचा था खून से,
हर एक बीज बोया था मैंने जूनून से

इक रोज़ भी न मैं तो आराम कर सका,
इक रात भी न मैं तो सोया सुकून से

अपनाने के हर शख्स को चक्कर मेँ पड़ गया
उम्दा बड़ा नसीब था देखो बिगड़ गया

फस्ले ताल्लुक पे फूल लगे, दाने नहीं आते,
हाँ मुझे ही रिश्ते निभाने नहीं आते

अरबाबे जिगर, चलती रह पे मुझे छोड़ गये
गुल जितने हसरतों के थे सब तोड़ गये

ज़र्द सूखे हुये पत्ते सा बदन है मुझ पर
मेरा क़तरा ए लहू तक भी वो निचोड़ गये

आँखोँ मेँ नमी है धड़कन भी थमी है
हर शख्स कह रहा मुझमें ही कमी है..

मुझको दस्ते हुनर आगे फैलाने नही आते
हाँ मुझे ही रिश्ते निभाने नहीं आते

ये गीत मुझको ही गुनगुनाने नहीं आते,
हाँ मुझे ही रिश्ते निभाने नहीं आते

जनाब admin साहब मैंने कल ही OBO  ज्वाइन की है, मैं न तो कोई शायर हूँ और न ही लिखने की  बुनियादी जानकारी ही मुझे है, बस जाने कहा से ये शौक आ गया और मै कुछ तुकबंदी सजाने लगा.... मुझे कल ही इस महा उत्सव के बारे मै मेल आया था, और बहुत ही कम वक़्त था मेरे पास, अपने मेरी ये ग़ज़ल यहाँ पोस्ट करके मुझे जो ख़ुशी दी है मै अल्फाज़ मै बयां नहीं कर सकता, मुझे बिलकुल उम्मीद नहीं थी कि अब ये ग़ज़ल महा उत्सव मैं शामिल हो पायेगी .. आपका तहे दिल से शुक्रिया ..

इमरान साहिब आपकी रचना वाकई खुबसूरत है, बहुत ही सुंदर ख्यालात है किन्तु यह ग़ज़ल की कैटोगरी में नहीं है, इसे नज्म कही जा सकती है, साथ में यह भी कहना है कि आप में वो प्रतिभा है जिससे आप ग़ज़ल भी कह सकते है, ग़ज़ल के लिए महत्वपूर्ण ख्यालात आप के पास है बस कुछ ग़ज़ल कि आधार जानकारी कि जरूरत है और उस जरूरत को पूरा करने हेतु OBO है | 

आप नीचे दिए लिंक पर जाकर OBO पर संचालित आदरणीय तिलक सर की ग़ज़ल की कक्षा ज्वाइन कर ले और सभी पाठों का अध्ययन कर ले | 

http://www.openbooksonline.com/group/kaksha

हार्दिक धन्यवाद् गणेश जी, मैं समझ तो रहा था के ये ग़ज़ल नहीं है लेकिन सौरभ जी ने इसे ग़ज़ल कहा तो मैंने समझा ग़ज़ल ही होगी.... धन्यवाद् अपने मेरी इस्लाह की ... बहुत दिनों से मुझे उस्ताद की ज़रुरत भी थी मगर मसरूफियत और संकोच के कारन मैं रियल लाइफ मैं ये सब न कर सका अब लगता है के अपने अरमान मैं निकल ही लूँगा मैंने ओपन बुक ज्वाइन करते ही सबसे पहले उस कक्षा को ज्वाइन किया था.. अब वहां मुझे लगता है के मैं काफी इल्म हासिल करूंगा
आदरणीय योगराज भाईसाहब, इस महती और श्रम साध्य कार्य के सफल सम्पादन के लिए पाठक-वर्ग आपका दिल से शुक्रगुज़ार है.
इमरान खान भाई को अच्छी ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद.
सौरभ भाई, मेरे लिए बाईस ए मसर्रत है के आपको मेरी ग़ज़ल अच्छी लगी, बहुत शुक्रिया आपका....

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