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CHANDRA SHEKHAR PANDEY
  • Male
  • बिहार, कैमूर, वर्तमान में बीएचयू वाराणसी में शोधरत
  • India
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Profile Information

Gender
Male
City State
VARANASI
Native Place
लहुरीबारी, मोहनियां जिला कैमूर बिहार
Profession
Teacher Educator, M.Ed,M.B.A, UGC-NET(Education), PhD Pursuing from B.H.U Varanasi.
About me
मूलस्थान- कैमूर बिहार। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी, से बीए, बीएड, एम एड(2002-07) करने के बाद राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा,2007 में शिक्षाशास्त्र विषय से उत्तीर्ण की और फिर यूनिवर्सिटी आफ एलाहाबाद से एमबीए 2008-10 किया। एक वर्ष तक 2010-11 एक राष्ट्रीय स्तर की नान प्राफिट संस्था न्यू एजुकेशन ग्रुप फाउंडेशन फार इन्नोवेशन एंड रिसर्च, इन एजुकेशन दिल्ली आधारित, में बतौर जिला समन्वयक, उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में समाज सेवा की। एक वर्ष 2011-12 श्रीराम कालेज आफ मैनेजमेंट (मुजफ्फरनगर) में अध्यापन किया। वर्तमान में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में शिक्षा संकाय में अंतर्नुशासनात्मक अनुसंधान में संलग्न हूं। नवीनतम शैक्षिक उपलब्धि में प्रबंधशास्त्र में यूजीसी नेट उत्तीर्ण किया (जून 2013)

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CHANDRA SHEKHAR PANDEY's Blog

ग़ज़ल - शेखर 'शम्स'

1212 1122 1212 22

तड़पने वाले को हरगिज़ न ख़ून देते हैं

ये हैं वो लोग जो सबको जूनून देते हैं

ख़ुदा को देख सकें इनमें वो नज़र ही नहीं

बुतों को देख के दिल को सुकून देते हैं

जो दम लिया तो फ़लक गिर न जाएगा नीचे

हमारे हौसले इसको सुतून देते हैं

धधकना दिल के भी शोलों का यूं ज़रूरी है

ये फ़स्ले -दर्द को इक मानसून देते हैं

बढ़ा है शाम को दर्दे जिगर कुछ ऐसे 'शम्स'

सितारे मर्ग़ का हमको शुगून देते…

Continue

Posted on July 14, 2015 at 11:00am — 7 Comments

बैठ गया

दहाने-ज़ख्म में वो कील कर के बैठ गया

वफ़ा की खुश्बुओं की झील कर के बैठ गया।



न कर सका जो अपने ख़्वाब की तरफदारी

वो अपनी अक़्ल को वकील कर के बैठ गया



नशा चढ़ा है सुर्खियों का इस क़दर उसको

कि अपने आप को जलील कर के बैठ गया।



फिर आज दिल ने मुझ को कू ए यार में टोका

फिर आज उससे मैं दलील कर के बैठ गया।



तुम्हारे बाद हिज़्र की हमारी हर शब को

फ़लक कुछ और ही तवील कर के बैठ गया।



वफा की राह तो थी दश्ते-कर्बला 'शेखर'

वो हक़ की चाह को… Continue

Posted on November 27, 2014 at 10:24pm — 6 Comments

ग़ज़ल

फेसबुक पर ग़ज़लसराई की
हद है आखिर ये ख़ुदनुमाई की


क्या कहें इनकी पारसाई की
नस्ल पूछे है भाई भाई की

चंद खुशियाँ अगर नहीं बाँटीं
ज़िन्दगी भर में क्या कमाई की

रास्तों ने मेरी खिलाफ़त में
मंज़िलों से बहुत बुराई की।

इस जहाँ में न जीते जी पूछा
बाद मेरे बहुत बड़ाई की।

है सियासत भी दीन की महमाँ
हैसियत इसकी घर-जमाई की

मौलिक व अप्रकाशित

Posted on November 24, 2014 at 10:30am — 4 Comments

ग़ज़ल

मुहब्बत में कोई रिश्ता नहीं देखा
परिंदा क़ैद में उड़ता नहीं देखा।

वफ़ा को क़ैद कहना है ख़िरदमंदी
ख़िरदमंदों को कुछ जँचता नहीं देखा।

सुनो फ़ितरत तो कुदरत ही बनाती है
शरीफों को कभी गिरता नहीं देखा।

ये आशिक़ सब के सब जैसे ज़नाना हैं
इन्हें हर बात पे रोता नहीं देखा?

बनाए रास्तों पर क्या चलें शेखर
फ़लक पे मैंने तो रस्ता नहीं देखा!

मौलिक व अप्रकाशित

Posted on November 23, 2014 at 6:16am — 7 Comments

Comment Wall (6 comments)

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At 12:40pm on November 11, 2015, ASHISH KUMAAR TRIVEDI said…

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ

At 9:50am on November 20, 2013, लक्ष्मण रामानुज लडीवाला said…

आपकी मित्रता स्वीकार करते हुए ख़ुशी हो रही है श्री बृजेश नीरज जी | आशा है हम

मिलकर साहित्य वृद्धि  में अपना अधिक योगदान दे पायेंगे |

At 2:41pm on November 19, 2013, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

मित्र 

आपका हृदयं  से स्वागत है   i 

सस्नेह  i

At 9:56am on September 27, 2013, Abhinav Arun said…

सफल समर्थ सशक्त शिखर हों ..बहुत शुभकामनायें श्री शेखर जी !!

At 11:12am on August 18, 2013, डा॰ सुरेन्द्र कुमार वर्मा said…

शुभकामना और उफनती सुन्दर रचनाओं के लिए बधाई.

At 1:38pm on August 11, 2013, mrs manjari pandey said…

  धन्यवाद चन्द्रशेखर जी ! आपको रचना सरस लगी !

 
 
 

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