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June 2010 Blog Posts

kaash!

काश!


काश!अपना कह देने भर से ही

गैर अपने होते

तो अनजान शहर में भी

अजनबी लोगों से घिरे

खुशनमा सपने होते

मगर हकीकत तो यह की

अपने ही शहर में अपने

बेगानों सा मिला करते हैं

क्यों खफा रहते हैं आप हम से

इस पर यह गिला करते हैं



रजनी छाबरा

Added by rajni chhabra on June 2, 2010 at 9:00am — 7 Comments

MERE BACHPAN ke khel and kuch mastiaa

kya bachpan hota hai yar ab bachpan ki kimat samajh aati hai us waqt lagta tha ki jaldi se bara ho jaun to koi padhne ke liye nahi kahega khele aur ghumne ki puri aajadi hogi. result nikalne se 1 din pehle ye manata tha ki bhagwan is par kisi tarah pass kar do next class me man laga ke padhenge. kya ajib sab khel humlog khelte the



1. budhiya kabaddi

2. kabbadi

3. noon tha

4 Gilli danda

5. Goli

6. Lakri choo

7. cricket jisme wicket 9-10 bricks se bante… Continue

Added by Ajit kumar sinha on June 1, 2010 at 8:22pm — 6 Comments

खुटे की गाय और प्रजातंत्र

वैसे तो
खुटे से बंधी चरती गाय
और प्रजातंत्र में
कोई समानता नहीं दिखती ॥
मगर
थोडा गौर फरमायें
तीन महत्वपूर्ण बिंदु ....
खूंटा , गाय और रस्सी ॥

खूंटा मतलब संबिधान
अपनी जगह स्थिर
गाय मतलब नेता
चारों ओर चरने वाला
और रस्सी यानी वोटर


इस रस्सी को जब चाहो
तोड़ दो , मोड़ दो , काट दो
है ना समानता ॥

क्या हम सब रस्सी
आपस में मिलकर .....
गाय को नियंत्रित नहीं कर सकते ॥

Added by baban pandey on June 1, 2010 at 8:03pm — 6 Comments

बचपन

मैं कोई लेखक नहीं हु लेकिन मेरे अंदर कीड़ा मचला है अब ..शब्दों को पिरोना संजोना नहीं अत्ता है .. लेकिंग जो बातें हैं कही अनकही बस लिख देना है



गर्मी भीषण हो रही है दिल्ली में मगर बचपना याद दिला रही है..झारखण्ड में एक जगह है , साहिबगंज . वह एक तरफ झरने वाली पहाड़ी है दूसरी तरफ उत्तर वाहिनी गंगा ..चिलचिलाती धुप में कभी झरने में नहा के सुकून लेते थे केकड़ो को पकड़ पकड़ कर हमलोग उसके शल्य चिकित्सा किया करते थे . रोज़ स्कूल से भाग के गंगा नहाने जाते थे सारा दिन मस्ती शाम को आंखे लाल होती… Continue

Added by Anand Vats on June 1, 2010 at 1:03pm — 9 Comments

अन्दर की चिंगारी को खोजो

मैं

समुद्र की उन लहरों की तरह नहीं

जो बार -बार गिरती है / उठती है

और

किनारे तक आते - आते

दम तोड़ देती है ॥



मैं

उन घोड़ो की तरह भी नहीं

जिसे

चश्मा लगा देने पर

सुखी घास भी

हरी दूब समझ खा लेते हैं ॥





मैं

उन दिहाड़ी मजदूरों की तरह भी नहीं

जो १०० रुपया और एक पेट खाना पर

बुला लिए जाते है ....

राजनेताओ की रैलियो में

भीड़ जुटाने के लिए ॥



मैं तो चिंगारी हु मेरे दोस्त !!

सबके दिल में रहता… Continue

Added by baban pandey on June 1, 2010 at 12:49pm — 7 Comments

हरी

माँ की सुनायी प्रयाय्वाची पे आधारित कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी है ....

हरी गए हरी से मिलने , हरी बैठे हरी पास
ये हरी वोह हरी मिल गए , ये हरी भये उदास |

हरी अर्थात (साप , मेढक . नदी )

Added by Anand Vats on June 1, 2010 at 12:06pm — 1 Comment

क्षमा कीजिये मुझे मैं हाथ जोड़ता हू|

मैं तत्काल प्रभाव से मेरे सारे कार्यों से त्यागपत्र दे रहा हूँ -- मेरे इस्तीफे के लिए कारण है कि मैं आज सुबह काम पर जाने से पहले मुझे एहसास हुआ की बाल मजदूरी आपराध है|| आपसे शिकायत है की आप मुझे एहसास न दिला पाए .

Added by Anand Vats on June 1, 2010 at 11:50am — 6 Comments

बाल श्रमिक

बाल श्रमिक

वह जा रहा है बाल श्रमिक

अधनंगे बदन पर लू के थपेड़े सहते

तपती,सुलगती दुपहरी मैं,सर पर उठाये

ईंटों से भरी तगारी

सिर्फ तगारी का बोझ नहीं

मृत आकांक्षाओं की अर्थी

सर पर उठाये

नन्हे श्रमिक के बोझिल कदम डगमगाए

तन मन की व्यथा किसे सुनाये

याद आ रहा है उसे

मां जब मजदूरी पर जाती और रखती

अपने सर पर ईंटों से भरी तगारी

साथ ही रख देती दो ईंटें उसके सर पर भी

जिन हालात मैं खुद जे रही थी

ढाल दिया उसी मैं बालक को भी

माँ के… Continue

Added by rajni chhabra on June 1, 2010 at 1:33am — 7 Comments

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