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Tasdiq Ahmed Khan's Blog – January 2018 Archive (3)

ग़ज़ल (मैं क़िस्मत आज़माई कर रहा हूँ )

(मफ़ाईलुन -मफ़ाईलुन- फ़ऊलन)



मैं क़िस्मत आज़माई कर रहा हूँ |

शुरूए आशनाई कर रहा हूँ |

चुरा कर वो नज़र कहते यही हैं

मैं उनसे बेवफ़ाई कर रहा हूँ |

दिया है सिर्फ़ शीशा एब जू को

मैं कब उसकी बुराई कर रहा हूँ |

जमी जो धूल दिल के आइने पर

उसी की मैं सफ़ाई कर रहा हूँ |

सितमगर सिर्फ़ हक़ माँगा है अपना

मैं कब बेजा लड़ाई कर रहा हूँ |

परख लेना कभी भी वक़्ते मुश्किल

नहीं मैं ख़ुद नुमाई…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 31, 2018 at 12:30pm — 13 Comments

ग़ज़ल ( निकल कर तो आओ कभी रोशनी में )

ग़ज़ल ( निकल कर तो आओ कभी रोशनी में )

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(फऊलन-फऊलन-फऊलन-फऊलन)

चलाओ न तीरे नज़र तीरगी में |

निकल कर तो आओ कभी रोशनी में |

कमी दर्दे दिल में तो अब भी नहीं है

मज़ा आ रहा है तुम्हें दिल लगी में |

मेरी ही नहीं है यह सबकी ज़ुबा पर

लुटे क़ाफ़िले सब तेरी रहबरी में |

करूँ फ़ख़्र मैं क्यूँ न क़िस्मत पे अपनी

दिवाना हुआ हूँ तुम्हारी गली में |

यूँ…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 18, 2018 at 9:59pm — 10 Comments

ग़ज़ल (शिकायत भला हम करें क्या किसी से )

ग़ज़ल (शिकायत भला हम करें क्या किसी से )

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(फऊलन- फऊलन-फऊलन-फऊलन)

चुने हैं ग़मे यार अपनी ख़ुशी से |

शिकायत भला हम करें क्या किसी से |

मिले सिर्फ़ धोके ही अपनों से हम को

वफ़ा अब करेंगे किसी अजनबी से |

खिज़ाओं ख़बरदार उनकी है आमद

सदा फूल खिलते हैं जिनकी हँसी से |

मिला कर नज़र से नज़र यह बताएँ

हुआ दिल ये बर्बाद किस की कमी से |

कभी दोस्तों…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 18, 2018 at 9:33pm — 10 Comments

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