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सूबे सिंह सुजान's Blog – January 2019 Archive (2)

ग़ज़ल - गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

ग़ज़ल   

गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

अब सुने कौन गणतंत्र की सिसकियाँ

 

इसलिए आज दुर्दिन पड़ा देखना

हम रहे करते बस गल्तियाँ गल्तियाँ 

चील चिड़ियाँ सभी खत्म होने लगीं

बस रही हर जगह बस्तियाँ बस्तियाँ 

पशु पक्षी जितने थे, उतने वाहन हुए

भावना खत्म करती हैं तकनीकियाँ. 

कम दिनों के लिए होते हैं वलवले

शांत हो जाएंगी कल यही आँधियाँ   

अब न इंसानियत की हवा लग रही

इस तरफ आजकल बंद…

Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on January 25, 2019 at 6:27am — 4 Comments

ग़ज़ल - गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

              ग़ज़ल 

गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

अब सुने कौन गणतंत्र की सिसकियाँ

इसलिए आज दुर्दिन पड़ा देखना

हम रहे करते बस गल्तियाँ गल्तियाँ

चील चिड़ियाँ सभी खत्म होने लगीं

बस रही हर जगह बस्तियाँ बस्तियाँ

पशु पक्षी जितने थे, उतने वाहन हुए

भावना खत्म करती हैं तकनीकियाँ

कम दिनों के लिए होते हैं वलवले

शांत हो जाएंगी कल यही आँधियाँ

अब न इंसानियत की हवा लग…

Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on January 24, 2019 at 9:32pm — 7 Comments

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"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
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"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
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