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डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's Blog – January 2016 Archive (3)

हो जाते हैं हाथ दूर- गीत

(आदरणीय सौरभ पाण्डेय के पितृ-शोक  पर एक हार्दिक  संवेदना )

पहले संदर्भ प्रसंग सहित इस जगती में परिभाषित कर 

फिर हो जाते हैं हाथ दूर जीवन का दीप प्रकाशित कर

.

देते  हैं  वे  सन्देश  हमें

हर दीपक को बुझ जाना है

पर ज्योति-शेष रहते-रहते

शत-शत नव दीप जलाना है

फैलायी जो रेशमी रश्मि उसको अब रंग-विलासित कर

पहले संदर्भ प्रसंग सहित......

.

है  सहज  रोप  देना पादप

तप है उसको जीवित रखना

करना…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 21, 2016 at 10:00pm — 4 Comments

लोक मानस के बीच का राग

भाषा क्या है ?

चेतन प्राणियों में

वैचारिक अभिव्यक्ति का साधन

भाषा होती होगी

पशु-पक्षियों की भी

बस उसे हम समझते नहीं

जैसे विश्व की तमाम भाषाये

बाहर है

ह्मारी समझ की परिधि से

पर भाषा महत्वपूर्ण इसलिए नहीं है

कि उससे मनोभावों की तरह ही

संप्रेषित होते है विचार

भाषा का महत्त्व और उसकी ताकत

लोक मानस के बीच का वह राग भी है

वह अंतर्संबंध भी है 

जिसका जन्म होता है उसी भाषा से

जिससे होता…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 10, 2016 at 12:33pm — 3 Comments

कांपती हूँ निरंतर शिखा जो हूँ

मैं हूँ शिखा

उस टिमटिमाते दीप की

कि जिसको है

हवा का शाश्वत भय 

चुप क्यों खडा है तब

आ मार निर्दय !

मार खाने को बनी हैं

नारियां सुकुमारियाँ

मैं कांपती हूँ निरंतर

शिखा जो हूँ

प्रज्वलित उस दीप की  

(मौलिक अप्रकाशित )

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 2, 2016 at 6:09pm — No Comments

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