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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – January 2016 Archive (4)

पढ़ सके तू जो अगर - ग़ज़ल (लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

2122    1122    1122    22



खूब परहेज भी करता है दिखाने के लिए

है जरूरत भी मगर प्यार जमाने के लिए /1



सोच मत सिर्फ  बहाना है बहाने के लिए

वक्त है पास कहाँ तुझको मनाने के लिए /2



शौक पाला जो सितम हमने उठाने के लिए

आ गई  धूप  भी  राहों  में सताने के लिए /3



देख हालात को खुद ही तू  जगा ले अब तो

कौन  आएगा  तुझे  और  जगाने  के लिए /4



पढ़ सके तू जो अगर रोज किताबों सा पढ़

है नहीं  बात कोई  मुझ में छुपाने के लिए /5



कैसी किस्मत थी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 29, 2016 at 10:55am — 12 Comments

महज इक आदमी है तू - ग़ज़ल-(लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

1222    1222    1222    1222

**********************************

भला तू देखता क्यों है महज इस आदमी का रंग

दिखाई क्यों न देता  है धवल  जो दोस्ती  का रंग /1



सुना  है  खूब  भाता है  तुझे  तो  रंग भड़कीला

मगर जादा बिखेरे है  छटा सुन सादगी का रंग/2



किसी को जाम भाता है किसी को शबनमी बँूदें

किसे मालूम है कैसा भला इस तिश्नगी का रंग/3



महज इक आदमी है तू न ही हिंदू न ही मुस्लिम

करे बदरंग क्यों बतला तू बँटकर जिंदगी का रंग/4



अगर बँटना ही है तुझको…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 26, 2016 at 10:41am — 16 Comments

बरसात के पानी ने -ग़ज़ल (लक्ष्मण धामी मुसाफिर' )

2211     2222     2112            22

*************************************



हर हद को ही  तोड़ा है  बरसात के पानी ने

किस बात  को माना  है बरसात के पानी ने /1



उस वक्त तो सूखा था जीवन क्या हरा होता

अब  गाँव  डुबाया  है  बरसात  के पानी ने /2



ये  जश्न  की  बेला  है  सूखे  की  विदाई की

नदिया को भी  न्योता है बरसात के पानी ने /3



मत खेत की  बोलो तुम भाग्य ही ऐसा  था

घर  द्वार भी  रौंदा है  बरसात  के पानी ने /4



कल रात…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 20, 2016 at 7:00am — 14 Comments

खूब हुई है यार मुनादी-ग़ज़ल - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2222    2222    2222    222

*******************************



सुख  की  बात  यही  है  केवल  म्यानों  में  तलवारें हैं

बरना  घर  के  ओने  कोने  दिखती   बस  तकरारें  हैं /1



खुद ही जानो खुद ही समझो उस तट क्या है हाल सनम

इस  तट   आँखों   देखी   इतनी   बस  टूटी  पतवारें  हैं /2



रोज वमन  विष का  होता  है  नफरत का दरिया बहता

यार अम्न को  लेकिन  बिछती  हर  सरहद  पर तारें हैं /3



रोज  निर्भया  हो  जाती  है रेपिष्टों  का  यार  शिकार

गाँव  नगर …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2016 at 5:55am — 11 Comments

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