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Manan Kumar singh's Blog – February 2017 Archive (6)

गजल(जैसे तैसे आगे आता))

     #गजल#

       ***

 22 22 22 22

जैसे-तैसे आगे आता

मैं भी जनसेवक हो जाता!1

 

सेवा के आयाम बहुत हैं

अपनी सब करतूत गिनाता!2

 

नकली आँसू के छींटे दे

मन के माफिक मेवे खाता!3

 

पाँच बरस मुझको मिल जाते

चार पहर रोते फिर दाता!4

 

भाषा को हथियार बनाकर

जोर लगा मैं शोर मचाता!5

 

जात-धरम के पेड़ फफनते

थोड़े बिरवे और बढ़ाता!6

 

मेरी खातिर भींग कहें…

Continue

Added by Manan Kumar singh on February 26, 2017 at 11:08am — 4 Comments

गजल(खबरी)

#गजल#(खबरी)

***

22 22 22 22

बात कहूँ मैं मिर्च मिला के

सुन लेता हूँ कान लगा के।1



दूर कहीं से लाता कौड़ी

चिपका देता खूब सटा के।2



मेरी कथनी हरदम साबित

बढ़ जाता हूँ बात बढ़ा के।3



शास्त्र-पुराण उखड़ जाते हैं

मैं रहता हूँ पाँव जमा के।4



मेरा मौसम हरदम रहता

क्या कर सकते मुँह बिचका के।5



जूतम पैजार हुई सबकी,

जूझ रहे फिर कुर्सी पा के।6



चाहत की बलिहारी कितनी!

रखता मैं हर बार जगा… Continue

Added by Manan Kumar singh on February 19, 2017 at 9:00am — 17 Comments

गजल(इश्क को तोलते हैं कहाँ)

212 212 212
इश्क को तोलते हैं कहाँ,
जो तुले,बोलते हैं कहाँ?1

सिसकियाँ हों बँधी गाँठ में,
बावरी! खोलते हैं कहाँ?2

ऐ हवा! तू उड़ा के चुनर
पूछ, हम डोलते हैं कहाँ?3

गम पिये बस जिये अब तलक,
हम जहर घोलते हैं कहाँ?4

चूमते धड़कनें चाव से,
खुद कभी बोलते हैं कहाँ?5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on February 14, 2017 at 8:39pm — 16 Comments

गाँव की होली (लघु कथा)

गाँव में होली

 गाँव में होली अपनी उफान पर थी । चंदू  के द्वार पर सुबह से ही चौपाल बैठ गयी थी । उनका भतीजा कहीं बाहर कुछ काम करता था । उसीने शराब की कुछ बोतलें घर भेज रखी थीं । गाँव में उसका बड़ा भतीजा रहता था ; कुछ काम का, न काज का, बस दोस्त समाज का !खाने –पीनेवालों का ताँता सुबह से उसके दर पे लगने  लगा,मुफ्त में शराब और गोश्त के कुछ पर्चे मयस्सर जो हो रहे थे । बीच –बीच में माँ –बहन की भी हो जा रही थी। सुननेवालों के मजे –ही –मजे थे । हम भी अपने दरवाजे पर…

Continue

Added by Manan Kumar singh on February 12, 2017 at 7:41pm — 4 Comments

गजल(गीत कौवे गा रहे हैं आजकल)

2122 2122 212

*****************

गीत कौवे गा रहे हैं आजकल

कंठ कोयल के भरे हैं आजकल।1



दुश्मनी सारी भुलाकर मसखरे

फिर गले से मिल रहे हैं आजकल।2



गालियाँ देते परस्पर जो रहे

प्रीत के सागर बने हैं आजकल।3



आज दुबके हैं सभी गिरगिट यहाँ

रंग बदलू आ गये हैं आजकल।4



कुर्सियों का ताव इतना बढ़ गया

धुर विरोधी भा गये हैं…

Continue

Added by Manan Kumar singh on February 7, 2017 at 7:00pm — 12 Comments

गजल(तीर चले चुन चुन के कस कस)

22222222

तीर चले चुन-चुन के कस-कस

मन तो भूला जाता सरबस।1



बूढ़ा बरगद बौराया है

अँगिया- गमछा करते सरकस।2



छौंरा- छौंरी छुछुआये हैं

पुरवा घर-घर करती बतरस।3



बढ़नी लेकर काकी दौड़ी

सच तो सहना पड़ता बरबस।4



फागुन की फुनगी अँखुआयी

चौरा-चौरा होता चौकस।5



आतुर होकर आज हवाएँ

ढूँढ़ रहीं निज मरकज,बेकस।6



मन का मीत कहीं मिल जाये

मनुआ दौड़ चला जस का तस।7



रंग चढ़ा जिसको,वह उछले

बाकी कहते,रहने दो…

Continue

Added by Manan Kumar singh on February 4, 2017 at 8:30am — 22 Comments

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