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Manan Kumar singh's Blog – May 2016 Archive (4)

गजल(रात जब मुझको मिली...)

2122 212 2212

रात यूँ रसने लगी मेरी गजल

राग बन बहने लगी मेरी गजल।1



रोशनी हूँ चाँद की सुन लो सनम!

कान में कहने लगी मेरी गजल।2



फिर चली पुरवा सुहानी मंद-सी

कँपकपा गहने लगी मेरी गजल।3



अधखुले-से केश लहराते गगन

पाश में कसने लगी मेरी गजल।4



गुम हुई सहमे रदीफों की हवा

काफिये ढ़लने लगी मेरी गजल।5



चौंधिआयी आँख तारक मल रहे

प्रेम-रस पगने लगी मेरी गजल।6



धड़कनें अब थामकर बैठा 'मनन'

साँस बन चलने लगी मेरी… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 28, 2016 at 6:30pm — 12 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 2122 212

सैर करना हो रहा हावी बला की वार पर

चौखटें कब लाँघती वह बिलबिलाती द्वार पर।1



ध्यान केंद्रित कीजिये आचार फिर आहार पर

शर्करा कम लीजिये नजरें रखें जी खार पर।2



तेल-घी कुछ कम चपोड़ें सादगी सबसे भली

दाल-रोटी सब्जियाँ फल बात बनती चार पर।3



रात को बिस्तर लगाना जल्द होना चाहिए

ध्यान रहना चाहिए रोजी तथा व्यापार पर।4



त्यागिये बिस्तर सबेरे ताजगी देती हवा

भागिये मैदान में कर रोग- बाधा द्वार पर।5

मौलिक व… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 15, 2016 at 7:00pm — 6 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 2122

लोग कैसे रंग अपने कर लिये हैं

फूल की है चाह पर पत्थर लिये हैं।1



शेर मारे फिर रहे हैं दर- बदर अब

रोब उनके बकड़ियों ने हर लिये हैं।2



मुस्कुराकर मिल रहे हैं महफिलों में

हाथ में सब लोग तो खंजर लिये हैं।3



फूल की खेती करेंगे कह रहे सब

दिल बड़ा ही खुरदरा बंजर लिये हैं।4



भूलकर कल पार जाना था क्षितिज के

अस्थियों का वे अभी पंजर लिये हैं।5



दे रहे रिश्ते दुहाई देखिये भी

लोग अपनों का यहाँ तो डर लिये… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 11, 2016 at 8:04pm — No Comments

गजल(मनन)

2122 2122 212

कुर्सियों का खेल बस चलता रहा

आदमी हर बार कर मलता रहा।1



रोशनी की खोज में निकले सभी

रोज सूरज भी उगा, ढलता रहा।2



फैलता जाता तिमिर घर-घर यहाँ

बस उजाला हाथ है मलता रहा।3



सींचते बिरवे रहे हम श्वेद से

सूखना असमय जरा खलता रहा।4



मुश्किलें हों लाख दर पे देखिये

हर घड़ी सुंदर सपन पलता रहा।5



पंछियों का क्या ठिकाना,उड़ गये,

है अलग कलरव अमर चलता रहा।6



जो बुझाता आग तपकर रोज ही

आदमी वह आज भी… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 8, 2016 at 7:30am — 6 Comments

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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
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