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2122 2122 2122 212
सैर करना हो रहा हावी बला की वार पर
चौखटें कब लाँघती वह बिलबिलाती द्वार पर।1

ध्यान केंद्रित कीजिये आचार फिर आहार पर
शर्करा कम लीजिये नजरें रखें जी खार पर।2

तेल-घी कुछ कम चपोड़ें सादगी सबसे भली
दाल-रोटी सब्जियाँ फल बात बनती चार पर।3

रात को बिस्तर लगाना जल्द होना चाहिए
ध्यान रहना चाहिए रोजी तथा व्यापार पर।4

त्यागिये बिस्तर सबेरे ताजगी देती हवा
भागिये मैदान में कर रोग- बाधा द्वार पर।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment by Manan Kumar singh on May 17, 2016 at 6:58am
आभार आ. गोरखपुरी जी!
Comment by Manan Kumar singh on May 17, 2016 at 6:57am
आभार आ.समर साहब!
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 16, 2016 at 9:48pm
इस अनूठी सार्थक ग़ज़ल पर आ.आपको बहुत बहुत बधाई। ग़ज़ल का सब्जेक्ट ऐसा अनुपम भी हो सकता है कभी सोचा नही था।वआह्ह्ह्ह् मुबारक।
Comment by Samar kabeer on May 16, 2016 at 3:09pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
Comment by Manan Kumar singh on May 16, 2016 at 10:04am
आभार आपका राहिला जी,सादर।
Comment by Rahila on May 16, 2016 at 9:53am
बहुत बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय सर जी! हर शेर बहुत शानदार लगा । बहुत बधाई ।सादर नमन

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