Added by Sushil Sarna on May 30, 2026 at 2:42pm — No Comments
बह्र: 22 22 22 22 22 2
रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए
जंगल का कानून है पहला, चुप रहिए
मँहगाई से पागल जनता, चुप रहिए
पूँजीपति को सारी सुविधा, चुप रहिए
प्रश्न…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 30, 2026 at 10:17am — 1 Comment
एक हो दास्तां तो सुनाएं,
लंबी है कहानी, फिर कभी।
मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,
वो धुंधली सी निशानी, फिर कभी।
अभी तो ज़ख्म ही ताज़ा बहुत हैं,
वो यादों की ज़बानी, फिर कभी।
अकेलेपन से दोस्ती कर ली है मैंने,
तुम्हारी मेहरबानी, फिर कभी।
मिरी जुनूँ की दीवानी न देखी तुमने,
वहशतों का ये मंज़र, फिर कभी।
लबों पर ठहरी है बात जो अब तलक,
वही बे-ज़ुबानी, फिर कभी।
ख़लाओं में जो ढूँढती है तुम्हें,
हमारी हैरानी, फिर…
ContinueAdded by रोहित डोबरियाल "मल्हार" on May 29, 2026 at 12:45pm — No Comments
समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है
समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।।
समय का खेल कुछ यूँ है कि कट जाए हो जैसा भी
कहीं गर हो बुरा तो भी ये अनुभव ही कराता है।।
बड़ा बलवान होता है समय इसकी बड़ी बातें
कोई कितना भी सँभले पर निवाला हो ही जाता है।।
समय को जिन्दगी में जो समझ ले है समय उसका
अजब हैं…
ContinueAdded by Awanish Dhar Dvivedi on May 19, 2026 at 4:45pm — No Comments
माँ यह शब्द नहींं केवल
इस जग की माँ से काया है।
हम सबकी खातिर अतिपावन
माँ के आँचल की छाया है।१।
माँ यह विषय अलौकिक है
परब्रह्म जीव के जैसा ही।
माँ इस सृष्टि की अनुपम है
कारक ईश्वर है ऐसा ही।२।
माता बच्चों की होती है
पालक सर्जक शुभ सुखराशी।
माँ की गोदी में पलते हैं
अज विष्णु ईश प्रभु अघनाशी ।३।
हैं शास्त्र सदा से ही कहते
माँ की पद्वी सर्वोत्तम है।
माँ का स्नेहामृत पाने को
जग में…
Added by Awanish Dhar Dvivedi on May 19, 2026 at 4:42pm — No Comments
बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें
Added by amita tiwari on May 14, 2026 at 10:00pm — 1 Comment
पाँच सालों की उम्र,
एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।
दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे हैं,
और हम... जो खेतों से कटकर आ रहे हैं।
वे हमारे 'अधिकार' नहीं निचोड़ते,
वे हमारे भीतर कहीं आत्मा तक निचोड़ते हैं।
पहले वे मीठी बातें करते हैं, जैसे शक्कर की चाशनी,
फिर हमें परतों में दबाकर,
हमारा 'रक्त' मत पेटियों (ईवीएम) के गिलास में भर लेते हैं।
जब चुनावी कोल्हू रुकता है,
तब हम इंसान नहीं बचते...
हम…
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