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दिनेश कुमार's Blog – June 2017 Archive (7)

ग़ज़ल --- बचपन था कोई झौंका सबा का बहार का ( दिनेश कुमार )

221____2121____1221____212



बचपन था कोई झौंका सबा का बहार का

लौट आए काश फिर वो ज़माना बहार का



खिड़की में इक गुलाब महकता था सामने

बरसों से बन्द है वो दरीचा बहार का



ख़ुशबू सबा की, ताज़गी-ए-गुल, बला का हुस्न

दिल के चमन को याद है चेहरा बहार का



अर्सा गुज़र गया प लगे कल की बात हो

उस बाग़े-हुस्न में मेरा दर्जा बहार का



दौरे-ख़िज़ाँ में दिल के बहलने का है सबब

आँखों में मेरी क़ैद नज़ारा बहार का



कलियाँ को बाग़बाँ ही… Continue

Added by दिनेश कुमार on June 30, 2017 at 8:08pm — 6 Comments

ग़ज़ल -- मैं आँखों में सपने बोना चाहता हूँ

22--22--22--22--22--2



बच्चों के मन जैसा होना चाहता हूँ

बे-फ़िक्री की नींदें सोना चाहता हूँ



दुनिया के मेले में खो कर देख लिया

अब मैं ख़ुद के भीतर खोना चाहता हूँ



राग द्वेष ईर्ष्या लालच को त्याग के मैं

रूह की मैली चादर धोना चाहता हूँ



प्यार का सागर है तू मैं प्यासा सहरा

अपनी हस्ती तुझ में डुबोना चाहता हूँ



जीवन व्यर्थ गँवाया, दिल पर बोझ है ये

ख़ुद से नज़र चुरा के रोना चाहता हूँ



गीली मिट्टी है, शायद जड़ पकड़ भी… Continue

Added by दिनेश कुमार on June 17, 2017 at 1:34pm — 4 Comments

ग़ज़ल -- अच्छे कर्मों का दिनेश अच्छा नतीज़ा होगा ( दिनेश कुमार )

2122____1122____1122____22



सर पे साया जो बुज़ुर्गों की दुआ का होगा

कामयाबी का सफ़र अपना सुहाना होगा



उसकी रोटी से जो आती है पसीने की महक

उसके घर ख़ुशबू-ए-बरकत का ख़ज़ाना होगा



रोज़े-महशर तेरी दौलत नहीं काम आयेगी

साथ बस तेरे सवाबों का पिटारा होगा



झूट को झूट सरे-बज़्म कहा है जिसने

देखना शर्तिया वो ज़हन से बच्चा होगा



मैंने ता-उम्र यही सोच के काटी अपनी

शब गुज़र जायेगी, क़िस्मत में सवेरा होगा



आबला-पाई मेरी और… Continue

Added by दिनेश कुमार on June 15, 2017 at 11:55pm — 2 Comments

ग़ज़ल -- दुनिया से जो बशर गये, लौटे हैं क्या कभी ? ( दिनेश कुमार )

221 -------- 2121 -------- 1221 - - - - 212



मानिंद-ए-शम्अ बज़्म में आ कर ग़ज़ल कहें

आलम है तीरगी का, मिटा कर ग़ज़ल कहें



रस्ते के सब पड़ाव क़वाफ़ी की शक़्ल हों

और लक्ष्य को रदीफ़ बना कर ग़ज़ल कहें



मफ़हूम क्या हो, चर्ख़े-तख़य्युल का चाँद हो

महफ़िल को हुस्ने-ख़्वाब दिखा कर ग़ज़ल कहें



गुलकन्द की मिठास, तग़ज़्ज़ुल, जदीदियत

हर शेर में ये ख़ूबियाँ ला कर ग़ज़ल कहें



होंठों पे सामयीन के आ जाए मरहबा

अल्फ़ाज़ उँगलियों पे नचा कर… Continue

Added by दिनेश कुमार on June 15, 2017 at 4:28am — 6 Comments

ग़ज़ल -- तू क्या बोले है ख़ुद अपने बारे में ( दिनेश कुमार )

22--22--22--22--22--2



बे-शक जन्नत होगी बलख-बुखारे में

छज्जू ख़ुश है अपने इस चौबारे में



दिले-मुसव्विर दुनिया की परवाह न कर

लोग तो नुक़्स निकालेंगे शह-पारे में



सारी बस्ती जल कर राख हुई देखो

थी चिंगारी एक सियासी नारे में



उसके नक़्शे-पा जब मील के पत्थर हैं

कुछ तो ख़ूबी होगी उस बंजारे में



तेरा काम ही चीख़ चीख़ कर बोेलेगा

तू क्या बोले है ख़ुद अपने बारे में



राजा बने भिखारी और भिखारी शाह

हश्र निहाँ हैं उसके… Continue

Added by दिनेश कुमार on June 10, 2017 at 3:28pm — 3 Comments

ग़ज़ल -- दुनियादारी में अब तक हम बच्चे थे

22--22--22--22--22--2



जो तूफ़ाँ के डर से तटपर ठहरे थे

बशर नहीं थे वो पुतले मिट्टी के थे



कब तक तेरी हाँ सुनने को रुकते हम

हमको अपने फ़र्ज़ अदा भी करने थे



दिल के ज़ख़्म बयाँ करना कुछ मुश्किल था

आँखों में आँसू लब पर अंगारे थे



हॉट पे क्या बिकता था मुझको क्या मतलब

मेरी जेब में बस ख़्वाबों के सिक्के थे



जिसका पेट भरा है वो क्या समझेगा

भूख से मरने वाले कितने भूखे थे



दरियाओं के संग न अपनी यारी थी

प्यास बुझाने… Continue

Added by दिनेश कुमार on June 5, 2017 at 3:59pm — 6 Comments

ग़ज़ल -- 'दिनेश' तुम इतने बदल गये

1221--2121--1221--212



ख़तरे में जब वज़ीर था प्यादे बदल गए

मौक़ा परस्त दोस्त थे पाले बदल गये



आये न लौट कर वे नशेमन में फिर कभी

उड़ने को पर हुये तो परिन्दे बदल गये



होंठों पे इनके आज खिलौनों की ज़िद नहीं

ग़ुरबत का अर्थ जान के बच्चे बदल गए



हालाँकि मैं वही हूँ मेरे भाई भी वही

घर जब बँटा तो ख़ून के रिश्ते बदल गये



ढलने पे आफ़ताब है मेरे नसीब का

देखो ये मेरी आँखों के तारे बदल गये



लहजे में गुल-फ़िशानी न… Continue

Added by दिनेश कुमार on June 5, 2017 at 8:46am — 6 Comments

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