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धर्मेन्द्र कुमार सिंह's Blog – July 2015 Archive (11)

उल्टी (लघुकथा)

सरकारी खर्चे पर होटल के कमरे में बैठे बैठे साहब ने एक तंदूरी मुर्गा खत्म किया। फिर पानी पीकर डकार मारते हुए किसी बड़े लेखक का अत्यन्त मार्मिक उपन्यास पढ़ने लगे। उपन्यास में गरीबों की दशा का जिस तरह वर्णन किया गया था वह पढ़ते पढ़ते साहब का पहले से भरा पेट और फूलने लगा। अन्त में जब साहब से पेट दर्द सहन नहीं हुआ तो वो उठकर अपनी मेज पर गए। दराज से अपनी डायरी निकाली और एक सादा पन्ना खोलकर शब्दों की उल्टी करने लगे।

पेट खाली हो जाने के बाद उन्हें…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 24, 2015 at 3:12pm — 14 Comments

बहाना (लघुकथा)

काली सड़क लाल खून से भीगकर कत्थई हो गई थी। एक तरफ से अल्ला हो अकबर के नारे लग रहे थे तो दूसरी तरफ जय श्रीराम गूँज रहा था। हाथ, पाँव, आँख, नाक, कान, गर्दन एक के बाद एक कट कट कर सड़क पर गिर रहे थे। सर विहीन धड़ छटपटा रहे थे। बगल की छत पर खड़ा एक आदमी जोर जोर से हँस रहा था।

एक एक कर जब सारे मुसलमानों के सर काट दिये गये तब बचे हुए दो चार हिन्दुओं की निगाह छत पर गई। वहाँ खड़ा आदमी अभी तक हँस रहा था। एक हिन्दू ने छलाँग मारकर खिड़की के छज्जे को पकड़ा और अपने शरीर को हाथों के दम पर उठाता हुआ…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 21, 2015 at 9:30am — 24 Comments

ग़ज़ल : दुश्मनी हो जाएगी यदि सच कहूँगा मैं

बह्र : २१२२ २१२२ २१२२ २

 

दुश्मनी हो जाएगी यदि सच कहूँगा मैं

झूठ बोलूँगा नहीं सो चुप रहूँगा मैं

 

आप चाहें या न चाहें आप के दिल में

जब तलक मरज़ी मेरी तब तक रहूँगा मैं

 

बात वो करते बहुत कहते नहीं कुछ भी

इस तरह की बेरुख़ी कब तक सहूँगा मैं

 

तेज़ बहती धार के विपरीत तैरूँगा

प्यार से बहने लगी तो सँग बहूँगा मैं

 

सिर्फ़ सुनते जाइये तारीफ़ मत कीजै

कीजिएगा इस जहाँ में जब न हूँगा…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 19, 2015 at 7:39pm — 8 Comments

ग़ज़ल : ख़ुदा बोलता है बशर में उतर कर

बह्र : १२२ १२२ १२२ १२२

ख़ुदाई जब आए हुनर में उतर कर

ख़ुदा बोलता है बशर में उतर कर

 

भरोसा न हो मेरी हिम्मत पे जानम

तो ख़ुद देख दिल से जिगर में उतर कर

 

इसी से बना है ये ब्रह्मांड सारा

कभी देख लेना सिफ़र में उतर कर

 

महीनों से मदहोश है सारी जनता

नशा आ रहा है ख़बर में उतर कर

 

तेरी स्वच्छता की ये कीमत चुकाता

कभी देख तो ले गटर में उतर कर

------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 16, 2015 at 4:14pm — 12 Comments

कविता : बाज़ और कबूतर

ऐसी दुनिया संभव ही नहीं है 

जिसमें ढेर सारे बाज़ हों और चंद कबूतर

 

बाज़ों को जिन्दा रहने के लिए

जरूरत पड़ती है ढेर सारे कबूतरों की

 

बाज ख़ुद बचे रहें

इसलिए वो कबूतरों को जिन्दा रखते हैं

उतने ही कबूतरों को

जितनों का विद्रोह कुचलने की क्षमता उनके पास हो

 

कभी कोई बाज़ किसी कबूतर को दाना पानी देता मिले

तो ये मत समझिएगा कि उस बाज़ का हृदय परिवर्तन हो गया है

-----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 15, 2015 at 10:55pm — 10 Comments

प्राकृतिक चुनाव (लघुकथा)

बड़े से मंदिर की बड़ी सी मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर खड़े एक बड़े आदमी ने कहा, "भगवन, हम सब जानते हैं कि प्रकृति उसी का चुनाव करती है जो सबसे शक्तिशाली होता है। जो प्रजाति कमजोर होती है और अपनी रक्षा नहीं कर पाती वो मिट जाती है। इस तरह सीमित संसाधनों का सबसे शक्तिशाली प्रजातियों द्वारा उपयोग किया जाता है और उसी से ये दुनिया विकसित होती है। तो भगवन मैंने जो मज़दूरों, गरीबों, कमजोरों और लाचारों का अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल किया है वो मैंने एक तरह से प्रकृति की मदद ही की है। ऊपर से मैंने आपका ये…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 13, 2015 at 9:30pm — 10 Comments

लघुकथा : परमज्ञान

भक्त ने भगवान से कहा, "भगवन! आपके पास जितना ज्ञान है वो सारा का सारा मुझे भी प्रदान कर दीजिए।"

भगवान बोले, "तथास्तु।"

भक्त को दुनिया की सारी कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक और धर्मग्रन्थ इत्यादि याद हो गए। उसे हर तरह की कला एवं संगीत का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो गया। उसे दर्शन एवं विज्ञान के सभी सिद्धान्त याद हो गए। इस तरह वह परमज्ञानी हो गया।

उसने अपनी कलम उठाई और एक कविता लिखने का प्रयास करने लगा। कुछ पंक्तियाँ लिखने के बाद उसे लगा कि इस तरह की कविता तो अमुक भाषा में…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 12, 2015 at 10:30pm — 13 Comments

कहानी : महासम्मोहन

(१)

विधान लोनी का जन्म 26 जनवरी 1950 को बनारस के जिला अस्पताल में हुआ था। उसके पिता निधान लोनी विश्वनाथ मंदिर के पास चाय बेचा करते थे। लोग कहते हैं कि विधान लोनी में उस लोदी वंश का डीएनए है जिसने उत्तर भारत और पंजाब के आसपास के इलाकों में सन 1451 से 1526 तक राज किया था। जब बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर भारत में मुगलवंश की स्थापना की तब इब्राहिम लोदी का एक वंशज बनारस भाग आया और मुगलों को धोखा देने के लिए लोदी से लोनी बनकर हिन्दुओं के बीच हिन्दुओं की तरह रहने…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 9, 2015 at 11:18am — 9 Comments

ग़ज़ल : ख़तरे में गर हो आब तो लोहा उठाइये

बह्र : २२१ २१२१ १२२१ २१२

हों जुल्म बेहिसाब तो लोहा उठाइये

ख़तरे में गर हो आब तो लोहा उठाइये

 

जिसको चुना है दिन की हिफ़ाजत के हेतु वो

खा जाए आफ़ताब तो लोहा उठाइये

 

भूखा मरे किसान मगर देश के प्रधान

खाते मिलें कबाब तो लोहा उठाइये

 

पूँजी के टायरों के तले आ के आपके

कुचले गए हों ख़्वाब तो लोहा उठाइये

 

फूलों से गढ़ सकेंगे न कुछ भी जहाँ में आप

गढ़ना हो कुछ जनाब तो लोहा…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 8, 2015 at 11:00pm — 23 Comments

बह्र : हुस्न का दरिया जब आया पेशानी पर

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २

 

हुस्न का दरिया जब आया पेशानी पर

सीख लिया हमने भी चलना पानी पर

 

राह यही जाती रूहानी मंजिल तक

दुनिया क्यूँ रुक जाती है जिस्मानी पर

 

नहीं रुकेगा निर्मोही, मालूम उसे

फिर भी दीपक रखती बहते पानी पर

 

दुनिया तो शैतान इन्हें भी कहती है

सोच रहा हूँ बच्चों की शैतानी पर

 

जब देखो तब अपनी उम्र लगा देती

गुस्सा आता है माँ की मनमानी पर

----------

(मौलिक एवं…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 6, 2015 at 6:30pm — 24 Comments

नवगीत : नाच रहा पंखा

देखो कैसे

एक धुरी पर

नाच रहा पंखा

 

दिनोरात

चलता रहता है

नींद चैन त्यागे

फिर भी अब तक

नहीं बढ़ सका

एक इंच आगे

 

फेंक रहा है

फर फर फर फर

छत की गर्म हवा

 

इस भीषण

गर्मी में करता

है केवल बातें

दिन तो छोड़ो

मुश्किल से अब

कटती हैं रातें

 

घर से बाहर

लू चलती है

जाएँ भला कहाँ

 

लगा घूमने का

बचपन से ही

इसको…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 2, 2015 at 6:26pm — 6 Comments

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