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Featured Blog Posts – August 2017 Archive (4)

अंतर्मन भावना - लघुकथा

"बेटा साहब को आदाब करो।" खालिद ने उसे इशारे से कहा तो बच्चे ने हाथ उठा जरा सा सिर झुका दिया।



कई हफ्तों बाद वह खालिद के पास आया था। एक हादसे में अकेला रह जाने के बाद से खालिद, 'घाटी' की उस खंडहर बनी मस्जिद में तन्हा ही जिंदगी गुजार रहा था और अक्सर दहशतगर्दो से जुडी अहम खबरें उसे दे दिया करता था। बच्चे को साथ देख वह सहज ही उसके बारें में जानने को उत्सुक हो गया। "इस बच्चे का परिचय नही दिया तुमने खालिद मियाँ!"



"कुछ ज्यादा तो मैं भी नहीं जानता साहब। बस यूँ समझिये, मेरी ही तरह… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on August 24, 2017 at 1:26pm — 13 Comments


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ग़ज़ल - अब हक़ीकत से ही बहल जायें ( गिरिराज भंडारी )

2122  1212   22 /122

मंज़रे ख़्वाब से निकल जायें

अब हक़ीकत से ही बहल जायें

 

ज़ख़्म को खोद कुछ बड़ा कीजे

ता कि कुछ कैमरे दहल जायें

 

तख़्त की सीढ़ियाँ नई हैं अब

कोई कह दे उन्हें, सँभल जायें

 

मेरे अन्दर का बच्चा कहता है  

चल न झूठे सही, फिसल जायें

 

शह’र की भीड़ भाड़ से बचते

आ ! किसी गाँव तक निकल जायें

 

दूर है गर समर ज़रा तुमसे

थोड़ा पंजों के बल उछल जायें

 

चाहत ए रोशनी में…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on August 23, 2017 at 8:11pm — 37 Comments

ग़ज़ल...वही बारिश वही बूँदें वही सावन सुहाना है-बृजेश कुमार 'ब्रज'

१२२२   १२२२ ​   १२२२    १२२२​

वही बारिश वही बूँदें वही सावन सुहाना है

तेरी यादों का मौसम है लबों पे इक तराना है



तुझी को याद करता हूँ तेरा ही नाम लेता हूँ

यही इक काम है बाकी तुझे अपना बनाना है



कभी जाये न ये मौसम बहे नैंनो से यूँ सावन

दिखाऊँ किस तरह जज्बात​ राहों में जमाना है



रही बस याद बाकी है यही फरियाद बाकी है

सुनाऊँ क्या जमाने को खुदी को आजमाना है



मिलन होता न उल्फत में कटेगी जिन्दगी पल में

ये साँसें हैं बिखर जायें अमर… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 22, 2017 at 5:00pm — 23 Comments

अंधी जनता, राजा काना बढ़िया है ...गज़ल

22-22-22-22-22-2



नये दौर का नया ज़माना, बढ़िया है

अंधी जनता, राजा काना, बढ़िया है



अब तो है यह उन्नति की नव परिभाषा,

जंगल काटो, पेड़ लगाना, बढ़िया है



अपना राग अलापो अपनी सत्ता है,

अपने मुंह मिट्ठू बन जाना, बढ़िया है



नई सियासत में तबदीली आई है,

आग लगा कर आग बुझाना, बढ़िया है



हत्या करना बीते युग की बात हुई,

अब दुश्मन की साख मिटाना, बढ़िया है



अगर कोख में बिटिया अब तक जिंदा है,

खूब पढ़ाना, ख़ूब बढ़ाना, बढ़िया… Continue

Added by Balram Dhakar on August 18, 2017 at 8:30pm — 18 Comments

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