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Tasdiq Ahmed Khan's Blog – August 2022 Archive (2)

ग़ज़ल - जो हसीनों से दिल लगाते हैं

ग़ज़ल
जो हसीनों से दिल लगाते हैं
वो हमेशा फरेब खाते हैं
सिर्फ़ कहते हैं वो यही है ग़म
मुझको अपना कहाँ बनाते हैं
ज़द में उनका मकां भी आएगा
जो पड़ोसी का घर जलाते हैं
बेवफ़ाई है आपकी फ़ितरत
हम तो करके वफा निभाते हैं
दिल में उठती है इक क़यामत सी
जब ख़यालों में उनको लाते हैं
पूछता ही नहीं उसे कोई
वो नजर से जिसे गिराते हैं
होश रहता नहीं हमें तस्दीक
उनसे जब भी नजर मिलाते हैं

(मौलिक एवं अप्रकाशित) 

Added by Tasdiq Ahmed Khan on August 23, 2022 at 11:24am — 1 Comment

हमको जाँ से ज़ियादा है प्यारा वतन

हमको जाँ से ज़्यादा है प्यारा वतन

सारी दुनिया से बहतर हमारा वतन

आपसी भाइचारे का हो खात्मा

कैसे करले भला ये गवारा वतन

यौमे आज़ादगी का है मंज़र हसीं

ढंक गया है तिरंगों से सारा वतन

सिर्फ़ हिन्दू मुसलमान सिख ही नहीं

सबकी जाँ सबकी आंखों का तारा वतन

दौर - ए - मुश्किल है इसकी हिफाज़त करो

दे रहा है सभी को सहारा वतन

रखिए फिरका परस्तों पे पैनी नज़र

कर नहीं दें ये फिर पारा पारा वतन

इसकी मिट्टी में शामिल है मेरा भी…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on August 23, 2022 at 11:00am — 8 Comments

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