For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Sushil Sarna's Blog – August 2016 Archive (8)

ये तो ख़्वाब हैं ...

ये तो ख़्वाब हैं ...

शब् के हों

या सहर के हों

सुकूं के हों

या कह्र के हों

ये तो ख़्वाब हैं

ये कभी मरते नहीं

ज़ज़्बातों के दिल हैं ये

ये किसी कफ़स में

कैद नहीं होते

ये नवा हैं (नवा=स्वर)

ये हवा हैं

ये ज़ुल्मों की आतिश से

तबाह नहीं होते

ये हर्फ़ हैं

ये नूर हैं

किसी सनाँ के वार से (सनाँ=भाला)

इन्हें अज़ल नहीं आती

पलकों की ज़िंदाँ में (ज़िंदाँ =कारागार)

ये सांस लेते हैं

ज़िस्म फ़ना होते हैं मगर…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 20, 2016 at 9:02pm — 8 Comments

इन्सां के लिए ... (क्षणिकाएं)

इन्सां के लिए ... (क्षणिकाएं)

1 .

एक पत्थर उठा

शैतां के लिए

एक पत्थर उठा

जहां के लिए

एक पत्थर उठा

मकां के लिए

देवता बन

जी उठा

एक पत्थर

इन्सां के लिए

...... ..... ..... .....

२.

मैं आज तक

वो रिक्तता

नहीं नाप सका

जिसमें

कोई माँ

अपने जन्मे को

तन्हा छोड़

ब्रह्मलीन हो जाती है

मन को शून्यता की

क़बा दे जाती है

..... ..... ..... ..... .....

३.

हमने

प्रवाहित कर दी थी…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 16, 2016 at 2:19pm — 10 Comments

आजादी के पावन पर्व पर....

आजादी के पावन पर्व पर.....

आजादी के पावन पर्व पर

तिरंगा हम फहराते हैं

मर मिटने को देश…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 15, 2016 at 11:31am — 8 Comments

भ्रम.....

भ्रम ....

कितनी देर तक

तुम अपने जाने से पहले

मुझे ढाढस बंधाते रहे

मेरी अनुनय विनय को

अपनी मजबूरियों के बोझ से

बार बार दबाते रहे

तुम्हारे दो टूक शब्दों का

मुझपर क्या असर होगा

तुमने एक बार भी न सोचा

बस कह दिया

मुझे जाना होगा

कब आना हो

कह नहीं सकता

मैं अबोध अंजान

क्या करती

सिर हिला दिया

नज़रें  झुका ली

अपनी व्यथा

पलकों में छुपा ली

तुम्हारे कठोर शब्दों का…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 14, 2016 at 4:30pm — 2 Comments

बहुत डरता है ......

बहुत डरता है ......

बहुत डरता है

मनुष्य अपने जीवन के

क्षितिज को देखकर

अपनी आकांक्षाओं के

असीमित आकाश में

जीवन के

सूक्ष्म रूप को देख कर

कल्प को अल्प

बनता देखकर

सच ! बहुत डरता है

मुखौटों को जीने से

थक जाता है 

संवदनाओं के

आडंबर के बोझ ढोने से

हार जाता है 

दुनिया के साथ जीते जीते

डर जाता है

हृदय की गहन कंदराओं में

अपने ही अस्तित्व की

मौन उपस्थिति…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 9, 2016 at 5:00pm — 8 Comments

ग़ुल अहसासों के ......

ग़ुल अहसासों के ......

क्यों

कोई

अपना

बेवज़ह

दर्द देता है

ख़्वाबों की क़बा से

सांसें चुरा लेता है

ज़िस्म

अजनबी हो जाता है

रूह बेबस हो जाती है

इक तड़प साथ होती है

इक आवाज़

साथ सोती है

कुछ लम्स

रक्स करते हैं

कुछ अक्स

बनते बिगड़ते हैं

शीशे के गुलदानों में

कागज़ी फूलों से रिश्ते

बिना किसी

अहसास की महक के

सालों साल चलते हैं

फिर क्यों

इंसानी अहसासों के रिश्ते

ज़िंदा होते हुए…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 6, 2016 at 4:19pm — 6 Comments

कितना अच्छा होता .....

कितना अच्छा होता .....

कितना अच्छा लगता है

फर्श पर

चाबी के चलते खिलौने देखकर

एक ही गति

एक ही भाव

न किसी से कोई गिला

न शिकवा

ऐ ख़ुदा

कितना अच्छा होता

ग़र तूने मुझे भी

शून्य अहसासों का

खिलौना बनाया होता

अपना ही ग़म होता

अपनी ही ख़ुशी होती

न लबों से मुस्कराहट जाती

न आँखों में नमी होती

सब अपने होते

हकीकत की ज़मीं न होती

ख़्वाबों का जहां न होता

बस ऐ ख़ुदा

तूने हमें भी वो चाबी अता की होती…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 2, 2016 at 7:30pm — 24 Comments

इक माँ होती है ....

इक माँ होती है ....

कितना ऊंचा

घोंसला बनाती है

नयी ज़िन्दगी का

ज़मीं से दूर

घर बनाती है

अपने पंखों से

अपने बच्चों को

हर मौसम के

कहर से बचाती है

न जाने कहाँ कहाँ से लाकर

अपने बच्चों को

दाना खिलाती है

पंख आते हैं

तो उड़ना सिखाती है

नए पंखों को

आसमां अच्छा लगता है

ज़मी से रिश्ता बस

सोने का लगता है

देर होते ही मां

घोंसले पे आती है

नहीं दिखते बच्चे

तो बैचैन हो जाती है

सांझ होते…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 1, 2016 at 2:27pm — 14 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"भूल जाता हूँ ये अक्सर कि उसे भूलना है अब किसी बात का भी होश किधर है साईं। इस पर एक उदाहरण देखें भूल…"
5 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
" सुना ही था "बड़ी मुश्किल ये डगर है साईं"  राह-ए-ईमाँ का तो गुल तक भी शरर है…"
5 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"कोई  सुनता नहीं मेरी वो असर है साईं   अब तो दीदावर न कोई न वो दर है…"
5 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आरंभ से गिरह तक सभी शेर बहुत अच्छे हुए। उर्दू के दृष्टिकोण से 9वें शेर में 'बहर' तथा 10…"
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। अच्छी गिरह के साथ गजल का अच्छा प्रयास हुआ है। हार्दिक बधाई।"
8 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"शह्र में झूठ का कुछ ऐसा असर है साईं अब तलक सच की नहीं ख़ैर ख़बर है साईं याद है या कोई रूहानी असर है…"
8 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"सुना ही था "बड़ी मुश्किल ये डगर है साईं"    राह-ए-ईमाँ का तो गुल तक भी शरर है…"
15 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
" कोई  सुनता नहीं मेरी वो असर है साईं   अब तो दीदावर न कोई न वो दर है…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"कोख से मौत तलक रात अमर है साईंअपने हिस्से में भला कौन सहर है साईं।१।*धूप ही धूप मिली जब से सफर है…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"सादर अभिवादन।"
yesterday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"स्वागतम"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  प्रस्तुत नवगीत को आपसे मिला उत्साहवर्द्धन हमें प्रयासरत रखेगा, आदरणीय अशोक…"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service