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Ram shiromani pathak's Blog – September 2014 Archive (6)

दोहे"माँ"

माँ की ममता का नहीं, होता कोई अंत।

सरिता है माँ नेह की, माँ का प्यार अनंत।।



माता बहना रूप में, हरदम करती प्यार।

मन जिनका निर्मल सदा, होता ह्रदय उदार।।



करुणा प्यार दुलार का,माँ का हरदम भाव।

कष्टों पर औषधि सदृश, भर जाती है घाव।।



कैसी भी हो परिस्थिति, माँ ही रहती साथ।

अपने बच्चों का कभी, नहीं छोड़ती हाथ।।



त्याग समर्पण के लिये, जग में माँ का नाम।

माँ के चरणों में बसे, सारे तीरथ धाम।।



माँ की ममता का यहाँ, कितना सुन्दर… Continue

Added by ram shiromani pathak on September 28, 2014 at 12:30pm — 16 Comments

दर्द में वो मुस्कुराया है।।

दर्द में वो मुस्कुराया है।
अज़ब मंज़र नज़र आया है।।

आज भी अकेला नहीं है वो।
वो है और उसका साया है।।

रोते-रोते हँस देता है।
ऐसा उसने क्या पाया है।।

वो मेरी ना हो पायेगी।
खुद को उसने समझाया है।।

उसका अपना कोई ना था।
लेकिन खुद को तो लाया है।।
***********************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on September 25, 2014 at 7:51pm — 8 Comments

"आये कोई जगाये मुझे"

आये कोई जगाये मुझे।
ज़िन्दा भी हूँ बताये मुझे।।1

हँसना मानों भूल गया हूँ।
आये कोई रुलाये मुझे।।2

उसे कभी भूल न पाउँगा।
उससे कहो भुलाये मुझे।।3

हमारे बीच कुछ बाकी हो।
नफ़रत हो गर जताये मुझे।।4

गर मैं एकलौता चिराग हूँ।
धुंध में कहीं जलाये मुझे।।5

वादा ना रोने का हो तो।
आये फिर गले लगाये मुझे।।6
*************************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on September 24, 2014 at 9:44am — 23 Comments

"खुद से खुद की दूरी क्यों"

खुद से खुद की दूरी क्यों।
ऐसी भी मजबूरी क्यों।।

गर वो सबकुछ जानता है।
उससे बात ज़रूरी क्यों।।

तेरी मेरी इक ज़ुबान।
पूरी बात अधूरी क्यों।।

रात रातभर बातें की।
होती बात न पूरी क्यों।।

गर वो सच में बेगुनाह।
फाँसी की मंज़ूरी क्यों।।

पता नहीं उसमें क्या है।
ऐसे को कस्तूरी क्यों।।
*******************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on September 10, 2014 at 7:07pm — 11 Comments

खाली घर बेसामान रहा हूँ।।

खाली घर बेसामान रहा हूँ।

अपने ही घर दरबान रहा हूँ।।



बदनामी का आलम है ऐसा।

यूँ खुद पे ही अहसान रहा हूँ।।



कभी कभी हँस लेता हूँ यारों।

आखिर मै भी इंसान रहा हूँ।।



अक्सर दिल से खेला करती है।

मै तो केवल सामान रहा हूँ।।



लगता है तुम तो भूल गये हो।

लेकिन मै तो पहचान रहा हूँ।।



वो जो अब मुझको छोड़ गये है।

उनका ही मै अरमान रहा हूँ।।



वो जाने किस शै में दिख जाये।।

अब सारी दुनियाँ छान रहा… Continue

Added by ram shiromani pathak on September 7, 2014 at 2:00pm — 12 Comments

मुझको अपना कहता है।।

मुझको अपना कहता है।
फिर क्यूँ तनहा रहता है।।

अन्दर का जो दरिया है।
आँखों से अब बहता है।।

मंज़िल तक जाना है गर।
रस्ते को क्यूँ तकता है।।

झगड़े की कुछ वजह न थी।
फिर क्यूँ झगडा करता है।।

खुद में झाँकूँ देखूँ तो।
अन्दर क्या कुछ दिखता है।।

पहले जी भर रोया था।
अब थोड़ा सा हँसता है।।
*****************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on September 7, 2014 at 1:30pm — 12 Comments

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