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Mohinichordia's Blog – September 2011 Archive (12)

स्त्री और प्रकृति

प्रकृति और स्त्री

स्त्री और प्रकृति

कितना साम्य ?

दोनों में ही जीवन का प्रस्फुटन

दोनों ही जननी

नैसर्गिक वात्सल्यता का स्पंदन,

अन्तःस्तल की गहराइयों तक,

दोनों को रखता एक धरातल पर…

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Added by mohinichordia on September 29, 2011 at 10:35am — No Comments

माँ

तेरी प्यारी सी सूरत 

ममता की मूरत 

तेरी आँखों से झरती करुणा

स्नेह का झरना

माँ! तेरी आँखों से झरती वो करुणा,

कब, मेरे अन्दर रिस गई,

मैं नहीं जान पाई?…



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Added by mohinichordia on September 21, 2011 at 8:30pm — 2 Comments

फिर प्रारम्भ होगा सृष्टिचक्र

 

 पुरुष !
विवाह रचाओगे ?
पति कहलाना चाहोगे?
पत्नी को प्रताड़ित करना छोड़ ,
अच्छे जीवन साथी बन पाओगे?


मेरी ममता तो जन्मों की भूखी है ,
बच्चों के लिए बिलखती है,
सृष्टि-चक्र, मेरे ही दम पर है…
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Added by mohinichordia on September 15, 2011 at 11:25am — 1 Comment

आत्म -जागरण

मैं स्त्री हूँ रत्नगर्भा ,धारिणी,

पालक हूँ, पोषक हूँ

अन्नपूर्णा,

रम्भा ,कमला ,मोहिनी स्वरूपा

रिद्धि- सिद्धि भी मैं ही ,

शक्ति स्वरूपा ,दुर्गा काली ,महाकाली ,…

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Added by mohinichordia on September 14, 2011 at 1:00pm — 7 Comments

सृजनहार ,तुम्हारी नगरी कितनी सुन्दर

आज

मुर्गे की बांग के साथ ही

प्रवेश किया मैंनें तुम्हारी नगरी में .

रुपहरी भोर ,सुनहरी प्रभात से ,

गले लग रही थी

लताओं से बने तोरणद्वार को पारकर आगे बढ़ी,

कलियाँ चटक रही थीं,

फूलों का लिबास…

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Added by mohinichordia on September 11, 2011 at 2:00pm — 10 Comments

मुक्तक

 हमने कुछ किया तो उसे फ़र्ज  बताया गया 

 उन्होंनें कुछ किया तो उसे क़र्ज/अहसान बताया गया 
आओ ! विसंगतियां  देखें जीवन की 
अपनी सुविधानुसार हमें शब्दों का अर्थ समझाया गया |


पाकर खुशी मेरे आँसू निकल पड़े ,
उन्होंनें समझा मै दु:खी हूँ 
मै…
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Added by mohinichordia on September 9, 2011 at 9:00pm — 1 Comment

वर्तमान

 कहते हैं

बस दो दिन और 
लेकिन दो दिन  और मिल जाते 
तब भी उतना ही कर पाते 
जितना अब तक किया है 
ययाति की तरह 
हम सब मौत से मोहलत 
मांगते रहते…
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Added by mohinichordia on September 7, 2011 at 9:42pm — 1 Comment

मुक्तक

 

कुछ दूर तक हम साथ चले 
ख्वाबों के साए साथ लिए 
हकीकत न बन सके ख्वाब 
लेकिन सोचती हूँ ,
उन चंद हसीन लम्हों की रोशनी काफी होगी 
बची हुई जिन्दगी का सफ़र 
तय करने के लिए |…
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Added by mohinichordia on September 7, 2011 at 8:48pm — 2 Comments

मुक्तक

  

तुम करीब आये हो प्रियतम

मन बन गया मधुबन मेरा

 तुमने प्रीत का रस उंडेला 

खिल गया मन कमल मेरा |…
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Added by mohinichordia on September 7, 2011 at 5:10pm — No Comments

परमसत्ता

 

मौन निःशब्द  रात्रि 

चारों ओर सन्नाटा 

नंगे पेड़ों पर गिरती बर्फ 

रुई के फाहे सी

रात को और भी गंभीर बनाती

शायद तुम्हारे ही आदेश से |

गरजते समुद्र की उफनती लहरें …

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Added by mohinichordia on September 6, 2011 at 2:07pm — No Comments

सृजनहार

 

हवा के पंखो पर चढ़कर 

आती है तेरी खुशबू 

नदियों के जल के साथ बहकर 

कभी प्रपात बनकर, निनाद करती 

अमृत सी झरती

आती है तेरी मिठास |

सूरज बनकर आता है कभी 

सात घोड़ो के रथ पर सवार…

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Added by mohinichordia on September 6, 2011 at 11:30am — 1 Comment

प्रकृति

मैं लिखना चाहती हूँ गीत 

तेरी प्रशंसा में, प्रकृति 

लेकिन तू तो स्वयं एक गीत है 

जीता जागता संगीत है 

लयबद्ध , तालबद्ध 

छंद है  ,गान है 

एक अनवरत अनचूक सिलसिला  है जीवन का |

तेरे मौसम…

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Added by mohinichordia on September 3, 2011 at 3:30pm — 5 Comments

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