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GOPAL BAGHEL 'MADHU''s Blog – November 2010 Archive (5)

सुर सुधाये हैं अधर पर आज मैंने

सुर सुधाये हैं अधर पर आज मैंने

मधु गीति सं. १४८१ रचना दि. २६ अक्टूबर २०१०



सुर सुधाये हैं अधर पर आज मैंने, सहजता से ओज ढ़ाला आज मैंने;

उम्र का अनुभव है बाँटा औ समेटा, साधना का सत्य चाखा और बाँटा.



तसल्ली किस को हुयी इस जगत आके, तंग दिल सब रहे हैं लाजें बचाके ;

खामख्वा कुछ खेल में नज़रें चुराके, बोझ अपने हृदय में रखते छुपाके.

आस्तिकी उर सात्विकी सुर मेरी सम्पद, ना बचा पाया हूँ इसके अलाबा कुछ;

करो ना बरबाद अपना वक्त मुझ पर, लूट क्या पाओगे जब ना… Continue

Added by GOPAL BAGHEL 'MADHU' on November 26, 2010 at 12:20pm — No Comments

कृत्य हमरा महत्व कम रखता

कृत्य हमरा महत्व कम रखता

(मधु गीति सं. १५२० दि. १७ नवम्बर, २०१०)



कृत्य हमरा महत्व कम रखता, स्वत्व हमरा जगत कृति करता;

अर्थ यदि अपना हम समझ पायें, स्वार्थ परमार्थ कर स्वत्व पायें.



कर्म उत्तम तभी है हो पाये, आत्म जब सूक्ष्म हमरा हो जाये;

ध्यान बिन स्वार्थ ना समझ आये, स्वार्थ बिन खोजे अर्थ न आये.

नहीं आनन्द यदि रहे उर में, दे कहाँ पांए उसे इस जग में;

रहें दुःख में तो कैसे सुख देवें, बिना खुद जाने खुदा क्या जानें.



समझना स्वयं का जरुरी… Continue

Added by GOPAL BAGHEL 'MADHU' on November 26, 2010 at 11:30am — No Comments

गहन तमसा में खिली एक ज्योत्सना है

मधु गीति सं. १५०२ दि. ४ नवम्बर, २०१०



गहन तमसा में खिली एक ज्योत्सना है, ज्योति की वह क्षीण रेखा उन्मना है;

नहीं अपना नजर उसको कोई आता, जोड़ पाती ना प्रकाशों से है वो नाता.



प्रकाशों की नाभि से वह निकल आयी, स्रोत के उस केंद्र से ना जुड़ है पायी;

खोजती रहती वही निज स्रोत सत्ता, दीप लौ बन खोजती है बृहत सत्ता.

अंधेरों से भिड़ प्रकाशों को संजोये, वाती जब तब स्वयं भी है झुलस जाए;

घृत प्रचुर दीपक की वाती जब न पाये, उर दिये का भी कभी वाती… Continue

Added by GOPAL BAGHEL 'MADHU' on November 7, 2010 at 1:05pm — 3 Comments

आयी है दीवाली

मधु गीति सं. १५०१ दि. ४ नवम्बर २०१०

आयी है दीवाली, घर घर में खुशहाली;
नाचें दे सब ताली, विघ्न हरें वन माली

जागा है मानव मन, साजा है शोधित तन;
सौन्दर्यित भाव भुवन, श्रद्धा से खिलत सुमन.
मम उर कितने दीपक, मम सुर खिलते सरगम;
नयनों में जो ज्योति, प्रभु से ही वह आती.

हर रश्मि रम मम उर, दीप्तित करती चेतन;
हर प्राणी ज्योतित कर, देता मम ज्योति सुर.
सब जग के उर दीपक, ज्योतित करते मम मन;
हर मन की दीवाली, मम मन की दीवाली.

Added by GOPAL BAGHEL 'MADHU' on November 7, 2010 at 1:02pm — 1 Comment

दिया प्रभु ने जलाया था

मधु गीति सं. १५०३ दि. ४ नवम्बर, २०१०





दिया प्रभु ने जलाया था, सृष्टि अपनी जब कभी भी;

आत्मा को तरंगित कर, उठाया था निज हृदय ही.



निराकारी भाव निर्गुण, बदलना वे जभी चाहे;

जला दीपक आत्मा में, सगुण का संकल्प लाये.

हुई सृष्टि प्रकृति की तब, तीन गुण अस्तित्व पाये;

संचरित हो बृाह्मी मन, पञ्च तत्व विकास पाये.



धरा के विक्षुब्ध मन में, बृाह्मी मन किया दीपन;

वनस्पति जन जन्तु हर मन, बृह्म ही तो किये चेतन.

वे जलाते दीप आत्मा, नित्य… Continue

Added by GOPAL BAGHEL 'MADHU' on November 7, 2010 at 12:59pm — 1 Comment

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