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बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog – December 2021 Archive (2)

ग़ज़ल-दुख

1222      1222      1222       122

किसी की बेरुख़ी है या सनम हालात  का दुख

परेशां  हूँ हुआ  है अब तुझे किस बात का दुख



तुम्हें  तो  पड़  गई  हैं  आदतें  सी  रतजगों  की

तुम्हें क्या फ़र्क़ पड़ता बढ़ रहा जो रात का दुख



जमाती  सर्दियाँ, फुटपाथ  का  घर, पेट  ख़ाली

उन्हें  सोने  नहीं  देता  कई  हालात  का  दुख



भिंगोते  रात  का आँचल  बशर अपने  ग़मों से…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 30, 2021 at 11:00am — 5 Comments

ग़ज़ल- एक पत्थर है ज़िन्दगी मेरी

2122 1212 22

बस यही इक फ़रेब खा बैठा
मैं उसे  ज़िन्दगी  बना  बैठा

एक  पत्थर है  ज़िन्दगी  मेरी
उसी पत्थर से दिल लगा बैठा

धूप  अपने  शबाब  पर आई
और साया भी  दूर जा  बैठा

ख़त्म  कैसे  भला  अँधेरा  हो
एक दीपक था जो बुझा बैठा

फिर ग़ज़ल रो पड़ी सरे महफ़िल
गीत फिर ग़म भरा सुना बैठा

'ब्रज' लिए है उदासियाँ अपनी
सामने  चाँद  अनमना  बैठा

(मैलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 18, 2021 at 12:30pm — 10 Comments

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