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तरही ग़ज़ल : कभी पगडंडियों से राजपथ के प्रश्न मत पूछो // -सौरभ

1222 1222 1222 1222

 

अभी इग्नोर कर दो, पर, ज़बानी याद आयेगी

अकेले में तुम्हें मेरी कहानी याद आयेगी

 

चढ़ा फागुन, खिली कलियाँ, नज़ारों का गुलाबीपन

कभी तो यार को ये बाग़बानी याद आयेगी

 

मसें फूटी अभी हैं, शोखियाँ, ज़ुल्फ़ें, निखरता रंग

इसे देखेंगे तो अपनी जवानी याद आएगी

 

मुबाइल नेट दफ़्तर के परे भी है कोई दुनिया

ठहर कर सोचिए, वो ज़िंदग़ानी याद आयेगी

 

कभी पगडंडियों से राजपथ के प्रश्न मत पूछो

सियासत की उसे हर…

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Added by Saurabh Pandey on February 28, 2018 at 2:30am — 28 Comments

ग़ज़ल - चाहे आँखों लगी, आग तो आग है.. // --सौरभ

२१२ २१२ २१२ २१२

 

फिर जगी आस तो चाह भी खिल उठी

मन पुलकने लगा नगमगी खिल उठी

 

दीप-लड़ियाँ चमकने लगीं, सुर सधे..

ये धरा क्या सजी, ज़िन्दग़ी खिल उठी

 

लौट आया शरद जान कर रात को

गुदगुदी-सी हुई, झुरझुरी खिल उठी

 

उनकी यादों पगी आँखें झुकती गयीं

किन्तु आँखो में उमगी नमी खिल उठी

 

है मुआ ढीठ भी.. बेतकल्लुफ़ पवन..

सोचती-सोचती ओढ़नी खिल उठी

 

चाहे आँखों लगी.. आग तो आग है..

है मगर प्यार की, हर घड़ी खिल…

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Added by Saurabh Pandey on October 8, 2017 at 1:00pm — 56 Comments

ग़ज़ल : भइ, आप हैं मालिक तो कहाँ आपसे तुलना

२२१ १२२१ १२२१ १२२ 

 

पिस्तौल-तमंचे से ज़बर ईद मुबारक़ 

इन्सान पे रहमत का असर, ईद मुबारक़

 

पास आए मेरे और जो ’आदाब’ सुना मैं

मेरे लिए अब आठों पहर ईद मुबारक़

 

हर वक़्त निग़ाहें टिकी रहती हैं उसी दर

पर्दे में उधर चाँद, इधर ईद मुबारक़ !

 

जिस दौर में इन्सान को इन्सान डराये

उस दौर में बनती है ख़बर, ’ईद मुबारक़’ !

 

इन्सान की इज़्ज़त भी न इन्सान करे तो

फिर कैसे कहे कोई अधर ईद मुबारक़ ?

 

जब धान उगा कर मिले…

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Added by Saurabh Pandey on June 25, 2017 at 3:30pm — 28 Comments

जनता कहती, कि सुने जनता (मदिरा सवैया) // -सौरभ

मदिरा सवैता  [भगण (२११) x ७ + गु]

 

पाँच विधानसभा फिर भंग हुई, नव रूप बुने जनता   

राज्य हुए फिर उद्यत आज नयी सरकार चुने जनता
शासन और प्रशासन हैं नतमस्तक, आज गुने जनता
तंत्र चुनाव विशिष्ट लगे.. जनता कहती, कि सुने जनता..
*********
-सौरभ

Added by Saurabh Pandey on February 13, 2017 at 10:47pm — 13 Comments

ग़ज़ल - तभी बन्दर यहाँ के चिढ़ गये हैं // --सौरभ

१२२२  १२२२ १२२

इन आँखों में जो सपने रह गये हैं

बहुत ज़िद्दी, मगर ग़मख़ोर-से हैं



अमावस को कहेंगे आप भी क्या

अगर सम्मान में दीपक जले हैं



अँधेरों से भरी धारावियों में

कहें किससे ये मौसम दीप के हैं



प्रजातंत्री-गणित के सूत्र सारे

अमीरों के बनाये क़ायदे हैं



उन्हें शुभ-शुभ कहा चिडिया ने फिर से

तभी बन्दर यहाँ के चिढ़ गये हैं



उमस बेसाख़्ता हो, बंद कमरे-

कई लोगों को फिर भी जँच रहे हैं …



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Added by Saurabh Pandey on October 20, 2016 at 4:00am — 26 Comments

यार, ठीक हूँ, सब अच्छा है ! (नवगीत) // --सौरभ

लोगों से अब मिलते-जुलते

अनायास ही कह देता हूँ--

यार, ठीक हूँ..

सब अच्छा है !..

 

किससे अब क्या कहना-सुनना

कौन सगा जो मन से खुलना

सबके इंगित तो तिर्यक हैं

मतलब फिर क्या मिलना-जुलना

गौरइया क्या साथ निभाये

मर्कट-भाव लिए अपने हैं

भाव-शून्य-सी घड़ी हुआ मन

क्यों फिर करनी किनसे तुलना

 

कौन समझने आता किसकी

हर अगला तो ऐंठ रहा है

रात हादसे-अंदेसे में--

गुजरे, या सब

यदृच्छा है !

 

आँखों में कल…

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Added by Saurabh Pandey on September 15, 2016 at 5:30pm — 23 Comments

ग़ज़ल - फ़िक्रमन्दों से सुना, ये उल्लुओं का दौर है // --सौरभ

2122  2122  2122  212

 

एक दीये का अकेले रात भर का जागना..

सोचिये तो धर्म क्या है ?.. बाख़बर का जागना !



सत्य है, दायित्व पालन और मज़बूरी के बीच

फ़र्क़ करता है सदा, अंतिम प्रहर का जागना !



फ़िक्रमन्दों से सुना, ये उल्लुओं का दौर है

क्यों न फिर हम देख ही लें ’रात्रिचर’ का जागना ।



राष्ट्र की अवधारणा को शक्ति देता कौन है ?

सरहदों पर क्लिष्ट पल में इक निडर का जागना !



क्या कहें, बाज़ार तय करने लगा है ग़िफ़्ट भी 

दिख रहा…

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Added by Saurabh Pandey on September 5, 2016 at 1:30pm — 22 Comments

एक तरही ग़ज़ल // --सौरभ

२२१ २१२१ १२२१ २१२



पगडंडियों के भाग्य में कोई नगर कहाँ ?

मैदान गाँव खेत सफ़र किन्तु घर कहाँ ? 

 

होठों पे राह और सदा मंज़िलों की बात

पर इन लरजते पाँव से होगा सफ़र कहाँ ? 

 

हम रोज़ मर रहे हैं यहाँ, आ कभी तो देख..

किस कोठरी में दफ़्न हैं शम्सो-क़मर कहाँ ? 

 

सबके लिए दरख़्त ये साया लिये खड़ा

कब सोचता है धूप से मुहलत मगर कहाँ !

 

जो कृष्ण अब नही तो कहाँ द्रौपदी कहीं ?

सो, मित्रता की ताब में कोई असर कहाँ ? 

 

क़ातिल…

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Added by Saurabh Pandey on August 16, 2016 at 4:00pm — 27 Comments

गाय हमारी माता है // --सौरभ

गाय हमारी माता है

हमको कुछ नहीं आता है..



हमको कुछ नहीं आता है

कि, गाय हमारी माता है !



गाय हमारी माता है

और हमको कुछ नहीं आता है !?



जब गाय हमारी माता है

हमको कुछ क्यों नहीं आता है ?



गाय हमारी माता है

फिरभी हमको कुछ नहीं आता है !



फिर क्यों गाय हमारी माता है..

जब हमको कुछ नहीं आता है ?



तो फिर, गाय हमारी कैसी माता है

कि हमको कुछ नहीं आता है ?



चूँकि गाय हमारी माता है..

क्या…

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Added by Saurabh Pandey on August 6, 2016 at 1:30am — 19 Comments

ग़ज़ल - भूल जा संवेदना के बोल प्यारे // --सौरभ

२१२२ २१२२ २१२२



फ़र्क करना है ज़रूरी इक नज़र में

बदतमीज़ों में तथा सुलझे मुखर में



शांति की वो बात करते घूमते हैं

किन्तु कुछ कहते नहीं अपने नगर में



शाम होते ही सदा वो सोचता है-

क्यों बदल जाता है सूरज दोपहर में



भूल जा संवेदना के बोल प्यारे

दौर अपना है तरक्की की लहर में



हो गया बाज़ार का ज्वर अब मियादी

और देहाती दवा है गाँव-घर में



आदमी तो हाशिये पर हाँफता है

वेलफेयर-योजनाएँ हैं…

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Added by Saurabh Pandey on July 1, 2016 at 12:30am — 30 Comments

ग़ज़ल - फूल भी बदतमीज़ होने लगे // - सौरभ

2122  1212  22/112

ग़ज़ल

=====

आओ चेहरा चढ़ा लिया जाये

और मासूम-सा दिखा जाये

 

केतली फिर चढ़ा के चूल्हे पर

चाय नुकसान है, कहा जाये

 

उसकी हर बात में अदा है तो

क्या ज़रूरी है, तमतमा जाये ?

 

फूल भी बदतमीज़ होने लगे

सोचती पोर ये, लजा जाये

 

रात होंठों से नज़्म लिखती हो,

कौन पर्बत न सिपसिपा जाये ? 

 

रात होंठों से नज़्म लिखती रही 

चाँद औंधा पड़ा घुला…

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Added by Saurabh Pandey on May 2, 2016 at 5:30pm — 44 Comments

देहात में, सिवान से (नवगीत) // --सौरभ

क्या हासिल हर किये-धरे का ?

गुमसी रातें

बोझिल भोर !

 

हर मुट्ठी जब कसी हुई है

कोई कितना करे प्रयास

आँसू चाहे उमड़-घुमड़ लें

मत छलकें पर

बनके आस

 …

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Added by Saurabh Pandey on December 30, 2015 at 2:32am — 6 Comments

एक तरही ग़ज़ल // --सौरभ

221 2122  221 2122

रौशन हो दिल हमारा, इक बार मुस्कुरा दो 

खिल जाय बेतहाशा, इक बार मुस्कुरा दो 

 

पलकों की कोर पर जो बादल बसे हुए हैं

घुल जाएँ फाहा-फाहा, इक बार मुस्कुरा दो

 

आपत्तियों के…

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Added by Saurabh Pandey on November 4, 2015 at 11:30pm — 24 Comments

ब्राह्मणवाद (अतुकान्त) // --सौरभ

अतिशय उत्साह

चाहे जिस तौर पर हो 

परपीड़क ही हुआ करता है 

आक्रामक भी. 

 

व्यावहारिक उच्छृंखलता वायव्य सिद्धांतों का प्रतिफल है 

यही उसकी उपलब्धि है 

जड़हीनों को…

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Added by Saurabh Pandey on September 6, 2015 at 7:30pm — 31 Comments

किन्तु इनका क्या करें ? (नवगीत) // -सौरभ

खिड़कियों में घन बरसते

द्वार पर पुरवा हवा..

पाँच-तारी चाशनी में पग रहे

सपने रवा !

किन्तु इनका क्या करें ?



क्या पता आये न बिजली

देखना माचिस कहाँ है

फैलता पानी सड़क…

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Added by Saurabh Pandey on July 4, 2015 at 2:00am — 38 Comments

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) पर विशेष // --सौरभ

योग वस्तुतः है क्या ?

===============

इस संदर्भ में आज मनोवैज्ञानिक, भौतिकवैज्ञानिक और विद्वान से लेकर सामान्य जन तक अपनी-अपनी समझ से बातें करते दिख जायेंगे. इस पर चर्चा के पूर्व यह समझना आवश्यक है कि कोई व्यक्ति किसी विन्दु पर अपनी समझ बनाता कैसे है…

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Added by Saurabh Pandey on June 21, 2015 at 3:30am — 26 Comments

ग़ज़ल - गीत कविता ग़ज़ल रुबाई क्या ? // --सौरभ

२१२२ १२१२ २२

साफ़ कहने में है सफ़ाई क्या ?

कौन समझे पहाड़-राई क्या ?



चाँद-सूरज कभी हुए हमदम ?

ये तिज़ारत है, ’भाई-भाई’ क्या ?



सब यहाँ जी रहे हैं मतलब से

मैं…

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Added by Saurabh Pandey on May 25, 2015 at 11:00am — 52 Comments

एक तरही ग़ज़ल // --सौरभ

मध्य अपने जम गयी क्यों बर्फ़.. गलनी चाहिये

कुछ सुनूँ मैं, कुछ सुनो तुम, बात चलनी चाहिये



खींचता है ये ज़माना यदि लकीरें हर तरफ  

फूल वाली क्यारियों में वो बदलनी चाहिये



ध्यान की अवधारणा है, ’वृत्तियों में संतुलन’

उस प्रखरतम मौन पल की सोच फलनी…

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Added by Saurabh Pandey on May 6, 2015 at 6:30pm — 40 Comments

एक तरही ग़ज़ल - होली है हुलासों की // --सौरभ

221 1222   221 1222

चुपचाप अगर तुमसे अरमान जता दूँ तो !

कितना हूँ ज़रूरी मैं, अहसास करा दूँ तो !

 

संकेत न समझोगी.. अल्हड़ है उमर, फिर भी..

फागुन का सही मतलब चुपके से बता दूँ तो

 

ये होंठ बदन बाहें…

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Added by Saurabh Pandey on February 26, 2015 at 6:00pm — 16 Comments

फिर-फिर पुलकें उम्मीदों में (नवगीत) // --सौरभ

फिर-फिर पुलकें उम्मीदों में

कुम्हलाये-से दिन !



सूरज अनमन अगर पड़ा था..

जानो--

दिन कैसे तारी थे..

फिर से मौसम खुला-खुला है..

चलो, गये जो दिन भारी थे..



सजी…

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Added by Saurabh Pandey on January 8, 2015 at 2:14pm — 13 Comments

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