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अधूरे अफ़साने :

अधूरे अफ़साने :

जाने कितने उजाले ज़िंदा हैं
मर जाने के बाद भी
भरे थे तुम ने जो
मेरी आरज़ूओं के दामन में
मेरे ख़्वाबों की दहलीज़ पर
वो आज भी रक़्स करते हैं
मेरी पलकों के किनारों पर

तारीकी में डूबी हुई
वो अलसाई सी सहर
वो अब्र के बिस्तर पर
माहताब की
अंगड़ाइयों का कह्र
वो लम्स की गुफ़्तगू
महक रही है आज भी
दूर तलक
मेरे जिस्मो-जां की वादियों में

तुम थे
तो अंधेरों से मोहब्बत थी हमको
जुदा हो कर तुमसे
गुम कर लिया है ख़ुद को
अंधेरों की क़बा में
आओ और ले जाओ
अपनी उल्फ़त की वो रिदा
सोये हैं जिसमें
ख़ामोश क़ुर्बतों के
अधूरे अफ़साने

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 613

Comment

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Comment by Sushil Sarna on June 17, 2020 at 9:28pm

आदरणीय डॉ छोटेलाल सिंह जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा से समृद्ध हुआ, हार्दिक आभार।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on June 4, 2020 at 7:35am

आदरणीय सुशील सरना जी बहुत ही अच्छी रचना हुई कितनी भी प्रशंसा की जाय कम है दिल से बधाई

Comment by Sushil Sarna on June 2, 2020 at 8:39pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब, सृजन के भावों पर आपकी स्नेह बरखा का दिल से आभार। आपके सुझाव का दिल से आभार। मैं इसे अभी एडिट करता हूँ। तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on June 2, 2020 at 8:37pm

आदरणीय  अमीरुद्दीन खा़न "अमीर " जी भावों पर आपकी मनोहारी प्रशंसा से सृजन सार्थक हुआ, हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on June 2, 2020 at 8:37pm

आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर जी भावों पर आपकी मनोहारी प्रशंसा से सृजन सार्थक हुआ, हार्दिक आभार।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 2, 2020 at 3:47pm

आदरणीय सुशील सरना जी, आदाब। "अधूरे अफ़साने" ख़़ू़ूबसूरत रचना के लिए आपको बहुत बधाईयाँ। सादर ।

Comment by Samar kabeer on June 2, 2020 at 3:22pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

'तारीक में डूबी हुई '

इस पंक्ति में 'तारीक' को "तारीकी" कर लें ।

'ग़ुम कर लिया है'

इस पंक्ति में 'ग़ुम' को "गुम" कर लें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 2, 2020 at 12:57pm

आ. भाई सुशील जी सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

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