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तेरे ख्वाहिशों के शह्र में- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२१/२


लिखना न मेरा नाम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में
आयेगा कुछ न काम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।१।
**
सबको पता है धूल से बढ़कर न मैं रहा कभी
ऊँचा भले ही दाम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।२।
**
सूरज न उगता भोर का तारों भरी न रात हूँ
ढलती हुई सी शाम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।३।
**
रावण बना दिया है मुझे प्यास ने हवस की यूँ
करना न मुझको राम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।४।
**
चाहत न कोई नाम की रिश्ता अगर बना कोई
चलना मुझे अनाम  तेरे  ख्वाहिशों के शह्र में।५।
**
मुझको सफर मिला हैं अभी दूर चाँद देश का
होगा  नहीं  विराम  तेरे  ख्वाहिशों के शह्र में।६।
*
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
मौलिक.अप्रकाशित

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 17, 2020 at 9:38pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार 

खुबसूरत गजल हुई 

मुझको सफर मिला हैं अभी दूर चाँद देश का
होगा  नहीं  विराम  तेरे  ख्वाहिशों के शह्र में।६।- वसः 
*

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 17, 2020 at 2:48pm

आ. भाई अमीरुद्दीन जी, पुनः उपस्थिति के लिए आभार ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 16, 2020 at 12:15am

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी आदाब, 

मिसरे का भाव समझाने के लिए शुक्रिया जनाब। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 14, 2020 at 3:18pm

आ. भाई अमीरुद्दीन जी, उसका भाव यह है कि अब राम जैसा सात्विक मत बनाना।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 13, 2020 at 6:22pm

//जहाँ तक चौथे शे'र का सवाल है उसे आपके कहे अनुसार करने से उसका भाव बदल जायेगा । //

जनाब लक्ष्मण धामी जी अगर मिसरा बदलने से भाव बदल रहा है तो मत बदलिये मगर जो भाव है उसे बता तो दीजिए हुज़ूर 

मैने पिछली टिप्पणी में भी यही जानना चाहा था "रावण बना दिया है मुझे प्यास ने हवस की यूँ

                                                                   करना न मुझको राम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।४।  इस शैर का भाव 

ख़ुसूसन सानी मिसरे का भाव समझा देंगे तो बड़ी इनायत होगी। सादर। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 12, 2020 at 8:59pm

आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति सराहना व सलाह के लिए हार्दिक आभार ।

जहाँ तक चौथे शे'र का सवाल है उसे आपके कहे अनुसार करने से उसका भाव बदल जायेगा । सादर...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 12, 2020 at 3:49pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति, स्नेह व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 12, 2020 at 3:47pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 12, 2020 at 3:35pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करें।

कुछ टंकण त्रुटियां रह गयी हैं जैसे लफ़्ज़ 'ख्वाहिशों' में ख के नीचे नुक़्ता लगा लें,

'मुझको सफर मिला हैं' में 'सफर' को सफ़र तथा 'हैं' को 'है' कर लें।

//रावण बना दिया है मुझे प्यास ने हवस की यूँ

करना न मुझको राम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।// जनाब शैर के सानी मिसरे में आप क्या कहना चाहते हैं भाव स्पष्ट नहीं है। 

आप चाहें तो सानी को यूँ कर के देख सकते हैं :   "करता न होश काम तेरे ख़्वाहिशों के शह्र में"   सादर। 

Comment by TEJ VEER SINGH on July 11, 2020 at 6:24pm

हार्दिक बधाई आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी।बेहतरीन गज़ल।

चाहत न कोई नाम की रिश्ता अगर बना कोई
चलना मुझे अनाम  तेरे  ख्वाहिशों के शह्र में।५।
**

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