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पहरूये ही सो गये हों जब चमन के- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२१२२/२१२२/२१२२


बेड़ियाँ टूटी  हैं  बोलो  कब स्वयम् ही
मुक्ति को उठना पड़ेगा अब स्वयम् ही।१।
*
बाँधकर  उत्साह  पाँवों  में चलो बस
पथ सहज होकर रहेंगे सब स्वयम् ही।२।
*
पहरूये ही सो गये हों जब चमन के
है जरूरत जागने की तब स्वयम् ही।३।
*
अब न आयेगा  यहाँ  अवतार हमको
करने होंगे मान लो करतब स्वयम् ही।४।
*
कल जो सेवक  हैं कहा करते थे देखो
हो गये है  आज  वो  साहब  स्वयम् ही।५।
*
बोलना सच उन के सम्मुख व्यर्थ है यूँ
वो निकालेंगे विविध मतलब स्वयम् ही।६।
*
रैंगनें की जब  रखोगे  आप फितरत
तो मरोगे  पाँव  नीचे  दब  स्वयम् ही।७।

(१७-२-२१)
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 19, 2021 at 7:11pm

आ. भाई गुमनाम जी, सादर अभिवादन । लम्बे अंतराल के बाद गजल और मंच पर आपकी उपस्थिति से हर्ष हुआ । सराहना के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 19, 2021 at 7:08pm

आ. भाई क्रिस मिश्रा जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद।

Comment by gumnaam pithoragarhi on February 19, 2021 at 6:41pm

वाह शानदार ग़ज़ल हुई है बधाई।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 19, 2021 at 5:17pm

अच्छी गजल हुई है आ. भैया हार्दिक बधाई।

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