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देना दाता वर यही, ऐसी हो पहचान | 
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख सब, बोलें यह इंसान ||
. 
कभी धूप कुहरा घना, कभी दुखी मुस्कान | 
खेल खेलती जिंदगी, कभी मान अपमान ||
. 
कोस रहा क्यों भाग्य को, बहा रहा क्यों नीर | 
'शून्य' मार्ग श्रम का पकड़, बदलेगी तक़दीर ||
.
घन छाए साहित्य पर, कलम सहे अपमान । 
लेन-देन से हो रहा, कवि, शायर, सम्मान ॥
.
हो उमंग नूतन चले, कलम इस तरह यार । 
फूले छंदों का सकल, सनातनी परिवार ॥
. 
- शून्य आकांक्षी  
.
( मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on June 12, 2021 at 12:25pm

श्री  बृजेश कुमार 'ब्रज' जी,
आपकी प्यारी टिप्पणी से मन प्रफुल्लित हो गया |  आपका हार्दिक आभार |  इसी प्रकार प्रेम बनाए रखिए | 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 19, 2021 at 5:34pm

बड़े ही सुंदर और सारगर्भित दोहे...बधाई आदरणीय

Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on May 9, 2021 at 12:25pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी,
सुन्दर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार | इसी तरह प्रेम बनाए रखिएगा | 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 8, 2021 at 7:04am

आ. आकांशी जी, सुन्दर दोहे हुए हैं । हार्दिक बधाई ।

कृपया ध्यान दे...

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