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मदिरा सवैया आधारित दो छन्द

1

माँ गुरु थी पहली अपनी जिसका तप पावन ज्ञान लिखूँ
छाँव मिली जिस आँचल में उसको सब वेद पुरान लिखूँ
गर्भ  पला जिसके  तन में  उसको अपना भगवान लिखूँ
मात  सनेह  समान  यहाँ कुछ  और नहीं  उपमान लिखूँ

2

साजन  जो परदेश  गए  करके   मकरन्द  विहीन कली
अश्रु गिरें दिन रात यहाँ  बरसे  जस  सावन  की  बदली
बात रही दिल में जितनी दिल ने दिल से दिल में कह ली
हाल  हुआ  दिल का अपने जस नीर बिना तड़पे मछली

नाथ सोनांचली

विधान : भानस ×7 + गुरु

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by नाथ सोनांचली on June 29, 2022 at 8:20pm

आद0 सौरभ पाण्डेय जी सादर प्रणाम

रचना पर आपकी उपस्थिति किसी पुरस्कार से कम नहीं।

हृदयतल से आभार प्रकट करता हूँ। सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 27, 2022 at 11:33pm

वाह, हार्दिक बधाई स्वीकारें< आदरणीय नाथ सोनांचली जी. 

आपके रचनाकर्म का उत्कर्ष दूसरे छन्द में ऊभर कर निखरा है. 

शुभातिशुभ

Comment by नाथ सोनांचली on June 17, 2022 at 3:22am

आद0 चेतन प्रकाश जी सादर अभिवादन। हृदयतल से आभार आपका

Comment by Chetan Prakash on June 16, 2022 at 10:40pm
आ. भाई, नाथ सोनांचली, मनभावन मदिरा सवैया छंदों की रचना की है, आपने, बधाई ! कदाचित भगण, भानस का अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प है!

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