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कौन क्या कहता नहीं अब कान देते // सौरभ

२१२२ २१२२ २१२२


जब जिये हम दर्द.. थपकी-तान देते
कौन क्या कहता नहीं अब कान देते 

 
आपके निर्देश हैं चर्या हमारी
इस जिये को काश कुछ पहचान देते

जो न होते राह में पत्थर बताओ
क्या कभी तुम दूब को सम्मान देते ?

बन गया जो बीच अपने हम निभा दें
क्यों खपाएँ सिर इसे उन्वान देते

दिल मिले थे, लाभ की संभावना भी,
अन्यथा हम क्यों परस्पर मान देते ?

जो थे किंकर्तव्यमूढों-से निरुत्तर
आज देखा तो मिले वे ज्ञान देते

आ गये फिर फूल क्या 'सौरभ' हॄदय में
दिख रहे हैं लोग फिर गुलदान देते
***
सौरभ

(मौलिक और अप्रकाशित) 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 27, 2026 at 12:11pm

 

आदरणीय रवि भसीन ’शाहिद’ जी, प्रस्तुति पर आपका स्वागत है।

इस गजल को आपका अनुमोदन मिला। आपसे मिले उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक आभार 

शुभ-शुभ

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on January 26, 2026 at 6:39pm

आदरणीय सौरभ पांडे जी, नमस्कार। बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है आपने, इस पे शेर-दर-शेर हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।

/बन गया जो बीच अपने हम निभा दें

क्यों खपाएँ सिर इसे उन्वान देते/

यह शेर विशेष रूप से बहुत पसंद आया। सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 12, 2025 at 2:05pm

आदरणीय रवि भाईजी, आपके सचेत करने से एक बात अवश्य हुई, मैं ’किंकर्तव्यविमूढ़’ शब्द के वैन्यासिक उच्चारण पर पुनर्चिंतन किया. वस्तुतः, कई विद्वान रचनाकार अपनी क्षेत्रीय या बोलचाल की भाषा की प्रकृति के अनुरूप विदेसज या तत्सम शब्दों के विन्यास को उच्चारण के अनुसार शाब्दिक कर लेते हैं. इसे आप भी जानते हैं. मैंने भी ऐसा ही करने का एक प्रयास किया था. लेकिन आपको उत्तर देने के बाद मैंने इस बिन्दु पर हर तरह से सोचा और आपके मन में बना अटपटापन मुझे भी तार्किक लगा. 
अतः मैं ’किंकर्तव्यविमूढ़’ शब्द के विमूढ़ को मूढ़ कर, चूँकि विशेष मूढ़ ही विमूढ़ होता है, उक्त शब्द को ’किंकर्तव्यमूढ़’ कर लिया. इससे आपके मन मे इस शब्द के विन्यास को लेकर  जो असहजता बनी थी, उसका भी निवारण हो गया तथा मिसरा भी आपकी सोच के अनुसार बहर में आ गया. 

यही तो इस मंच की विशेषता है. यहाँ रचनाओं पर बातें खुल कर होती हैं और मिल-बैठ कर शकाओं का उचित समाधान भी हो जाता है. आपकी जागरुकता तथा प्रयुक्त शब्द को लेकर मन में उपजे संदेह के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद, कि मैं भी इस तथ्य पर पुनर्विचार कर पाया. 
शुभ-शुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 25, 2025 at 1:48am

प्रस्तुति को आपने अनुमोदित किया, आपका हार्दिक आभार, आदरणीय रवि भाईजी। 

  

किंकर्तव्यविमूढ़ों में तव्य के व्य को एक गिन कर उसे एक गाफ की तरह प्रयुक्त किया गया है। मुझे भान है कि तव्य के व्य को एक गिनने में कई सहज नहीं होंगे। यह वस्तुत: उक्त तत्सम शब्द के उच्चारण की प्रतिकृति है। 

सादर 

Comment by Ravi Shukla on November 16, 2025 at 9:29am

आदरणीय सौरभ जी अच्छी गजल आपने कही है इसके लिए बहुत-बहुत बधाई

सेकंड लास्ट शेर के उला मिसरा की तकती हम नहीं कर पा रहे हैं कृपया इस पर सहायता कीजिएगा।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 12, 2025 at 1:02pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रस्तुति पर आपसे मिली शुभकामनाओं के लिए हार्दिक धन्यवाद .. 

सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 5, 2025 at 10:36pm

आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बेहतरीन गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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