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मेरी दस्तार ख़ानदानी है- ग़ज़ल

2122/1212/22
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हार तूफ़ान से न मानी है
कश्ती ने तैरने कि ठानी है


मेरी पलकों पे ये जो पानी है
ऐ मुहब्बत तेरी निशानी है


हमने माना बहुत पुरानी है
पर बहुत ख़ूब ये कहानी है


दिल पे चस्पां है जो नही मिटती
यूूँ तेरी हर शबीह फानी है


राख मैं कर चुका तेरे ख़त को
याद लेकिन मुझे ज़बानी है


हर किसी दर पे ये नही झुकती
मेरी दस्तार ख़ानदानी है


पहली बारिश है तिफ़्ल बन जाओ
फेंक दो क्यूँ ये छतरी तानी है


आब-संदल कभी थे हम दोनों
आज इक आग दूजा पानी है


जिसका अंजाम जंग तक पहुँचे
बात इतनी नहीं बढ़ानी है


उम्र सरहद को सौंपने वाले
कौन तुझसा यहाँ पे दानी है


इश्क़, फ़ुर्क़त, विसाल, रुसवाई
आशिक़ों की यही कहानी है
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शबीह- तस्वीर/ चित्र

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गजेन्द्र श्रोत्रिय

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 981

Comment

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Comment by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 11:27am

बढ़िया ग़ज़ल है आदरणीय गजेन्द्र जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. 

Comment by Ajay Tiwari on January 15, 2019 at 5:33pm

आदरणीय गजेन्द्र जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

Comment by Ravi Shukla on January 14, 2019 at 10:42am

आदरणीय गजेंद्र जी बहुत अच्छी गजल आपने कही छोटी बहर में अच्छे निकाले हैं दिली मुबारकबाद पेश करता हूं

Comment by Gajendra shrotriya on January 12, 2019 at 5:49pm

सराहना के लिए हार्दिक आभार आ० फूल सिंह जी।

Comment by PHOOL SINGH on January 10, 2019 at 11:48am

"भाई साहब " बहुत खूब उम्दा रचना बधाई स्वीकारें

Comment by राज़ नवादवी on January 10, 2019 at 9:43am

जी जनाब समर कबीर साहब, ध्यान रखूंगा, हो गई ग़लती के लिए क्षमा करें. सादर. 

Comment by Gajendra shrotriya on January 9, 2019 at 11:54am

अनुमोदन के लिए आपका आभारी हूँ आदरणीय समर कबीर साहिब।

Comment by Samar kabeer on January 8, 2019 at 3:06pm

राज़ साहिब,इस मंच पर उस्ताद शागिर्द की परिपाटी नहीं है,इसलिए मुझे उस्ताद न लिखा करें,हम सब एक परिवार के सदस्य हैं ।

Comment by राज़ नवादवी on January 8, 2019 at 2:38pm

आदरणीय  Gajendra shrotriya साहब, सुन्दर ग़ज़ल के प्रयास पे दिली मुबारकबाद. बाक़ी, मंच के उस्ताज़ जनाब समर कबीर साहब ने  जो इस्लाह फरमाई है यक़ीनन बहुत मुफ़ीद है. सादर. 

Comment by Samar kabeer on January 8, 2019 at 2:12pm

' दिल पे चस्पा है जो सिवा उसके
तेरी हर इक शबीह फानी है'

इस शैर को यूँ कर सकते हैं:-

'दिल पे चस्पां है जो नहीं मिटटी

यूँ तेरी हर शबीह फ़ानी है'

'दस्तार' और 'संदल' वाला शैर रख सकते हैं ।

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