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हद से गुज़र गई हैं ख़ताएँ  -सलीम रज़ा रीवा

मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

.

हद से गुज़र गई हैं ख़ताएँ तो क्या करें 

ऐसे में उनसे दूर ना जाएँ तो क्या करें 

oo

उसकी अना ने सारे तअल्लुक़ मिटा दिए 

उस बे-वफ़ा को भूल  जाएँ तो क्या करें   

oo

मीना भी तू है मय भी तू साक़ी भी जाम भी

आँखों में तेरी डूब न जाएँ तो क्या करें

oo

कश्ती को डूबने से बचाया बहुत मगर 

हो जाएं गर ख़िलाफ़ हवाएँ तो क्या करें

oo

खुशियों का इंतज़ार 'रज़ामुद्दतों से है 

पीछा अगर न छोड़ें बलाएँ तो क्या करें

.

बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by SALIM RAZA REWA on April 19, 2019 at 8:28am

जनाब अजय कुमार शर्मा जी ,
आपके हौसला अफ़जाई के लिए बहुत शुक्रिया ,

Comment by SALIM RAZA REWA on April 19, 2019 at 8:27am

जनाब सुशील सरना जी ,
आपके हौसला अफ़जाई के लिए बहुत शुक्रिया ,

Comment by SALIM RAZA REWA on April 19, 2019 at 8:25am

आपकी पुरख़ुलूस हौसला अफ़जाई का बेहद शुक्रिया मोहतरम समर साहब,

Comment by SALIM RAZA REWA on April 19, 2019 at 8:25am

बहुत शुक्रिया बृजेश जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 13, 2019 at 6:21pm

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है सलीम साहब..बधाई

Comment by Ajay Kumar Sharma on April 11, 2019 at 10:34am

सलीम रजा साहब बधाई स्वीकार करें.

बहुत सुन्दर गजल.

Comment by Sushil Sarna on April 10, 2019 at 6:39pm

वाह आदरणीय रज़ा साहिब, बहुत ही खूबसूरत अहसासों को अंज़ाम दिया आपने इस ग़ज़ल में। दिल से मुबारक कबूल फरमाएं सर।

Comment by Samar kabeer on April 9, 2019 at 6:04pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by SALIM RAZA REWA on April 8, 2019 at 11:14pm
अदरणीय तेज वीर सिंह जी,
आपकी मोहब्बत के लिए बहुत शुक्रिया
Comment by TEJ VEER SINGH on April 8, 2019 at 6:23pm

हार्दिक बधाई आदरणीय सलीम रज़ा रीवा जी।बेहतरीन गज़ल।

कश्ती को डूबने से बचाया बहुत मगर 

हो जाएं गर ख़िलाफ़ हवाएँ तो क्या करें

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