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सितारे-चाँद, अच्छे दिन, ऋणों की बात जपनी है
सजा कर बेचना है स्वप्न ये पहचान छपनी है
बनाते हम बड़ी बातें तथा जुमले खपाते हैं
सियासत तुम समझते हो मगर दूकान अपनी है 

 

जिन्हें तो चिलचिलाती धूप का अनुभव नहीं होना
कभी हाथों जिन्हें सामान कोई इक नहीं ढोना
जिन्हें ज़ेवर लदी उड़ती-मचलती औरतों का साथ
वही मज़दूर-मेहनत औ’ ग़मों का रो रहे रोना 

 

सियासत की, धमक से औ’ डराया ख़ूब अफ़सर भी
लिखा है पत्रिका में इंकिलाबी लेख जम कर भी
उठा कर मुट्ठियाँ अकसर भरी है चीख नारों की
मगर है ध्यान अर्जन पर.. न छोड़ा हक़ सुई भर भी
*****
सौरभ

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Hariom Shrivastava on May 8, 2019 at 9:47pm

वाह,वाहहह,शानदार मुक्तक। गजब की मारक क्षमता। हार्दिक बधाई आदरणीय सौरभ जी।...मगर दूकान अपनी है,वाहहह

Comment by नाथ सोनांचली on May 6, 2019 at 9:20am

आद0 सौरभ पांडेय जी सादर अभिवादन। मेरी रचनाओं पर आपका आना मेरे लिए पुरस्कार से कम नहीं। समयानुकूल आप अपनी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया से मेरी रचनाओं को अवश्य सुशोभित करें। सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 6, 2019 at 8:35am

आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी, आपका भाव बना रहे .. आपसे मिले अनुमोदन से मन प्रसन्न है. 

हार्दिक धनय्वाद

शुभ-शुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 6, 2019 at 8:33am

आदरणीय नरेन्द्र चौहान जी, आपको यह प्रयास अनुमोदनीय लगा यह मेरे लिए भी आश्वस्तिकारी है. हार्दिक धन्यवाद आदरणीय 

शुभ-शुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 6, 2019 at 8:32am

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ जी, आप जैसे विभिन्न छंद-अभ्यासियों से अनुमोदन मिलना आश्वस्त करता है. हार्दिक धनय्वाद भाई. 

एक बात और आपके सवैया छंद मनमोह रहे हैं. खैर, उनपर विशेष रूप से आऊँगा.

शुभातिशुभ

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 6, 2019 at 8:29am

भाई राम शिरोमणि, पटल पर आपसे मिला अनुमोदन विशेष है. हार्दिक धन्यवाद 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 6, 2019 at 8:28am

आदरणीय समर साहब, मुक्तकों को आपसे अनुमोदन मिला, मेरा रचनाकर्म सार्थक हुआ. हार्दिक धन्यवाद. 

जहाँ तक कुछ स्थापित मूल्यों को अपनाने या न अपनाने की बात है उसको लेकर कोई समझौता नहीं है. फिर भी हो चुकी भूल तो भूल ही है. उसे सुधारा जाना ही चाहिए. वस्तुतः, तीनों मुक्तक मोबाइल पर लिखे गये और पूरा होते ही उसी समय मोबाइल से ही पोस्ट कर दिए गये. अब मोबाइल के एडिट बॉक्स का आकार और विस्तार कई बार अपनी सीमाओं के कारण कई पहलुओं ओट में रखता है. सो हमसे भूल हो गयी. अलबत्ता, सुधार कर लिया है.

जय-जय 

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 6, 2019 at 8:22am

आदरणीय सुशील सरनजी,  पकी विशद टिप्पणी ने मुझे मेरे रचनाकर्म का मान बढ़ाया है इस हेतु आभार. आपकी छांदसिक रचनाओं के क्रम में हुई प्रगति भी हमें विशेष रूप से आश्वस्त करती है. 

शुभ-शुभ

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 4, 2019 at 8:29pm

आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। अति उत्तम मुक्तक हुए हैं। हार्दिक बधाई ।

Comment by narendrasinh chauhan on May 4, 2019 at 6:07pm

आदरणीय  सौरभजी , खूब सुन्दर !  इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार कीजिये

कृपया ध्यान दे...

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