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फागुन मन कंगाल सखी (राजेश कु0 झा)

बनिक भए

रंगरेज मेरे

बिछुआ, पायल

बेहाल सखी

फन काढ़

समीरन लाल चले

अंतर धधके सौ ज्‍वालमुखी

गठ जोड़ नयन

स्‍वादे आहट

कनखी जी का

जंजाल सखी

इत राग महावर

झाईं पड़े

उत फागुन है उत्‍ताल सखी

मन के झूमर

चुप बैठ गए

चूते अमिया

दुरकाल सखी

भ्रू-चाप चुने

महुआ नागर

मुसकै भदवा बैताल सखी

रस रस गलती

चलती चरखी

हर आस भई

पातालमुखी

अरदास खड़े

बिंदी, अंजन

दै कंगना भी सुर-ताल सखी

(पूर्णत: मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by राजेश 'मृदु' on March 21, 2013 at 5:33pm

आदरणीय सौरभ जी, आप सबकुछ कहें पर सादर और निवेदन जैसे शब्‍दों का प्रयोग मेरे लिए ना करें, मेरा मन आहत होता है । आपने सही कहा है समयाभाव अत्‍यधिक है, मेरी निरंतरता में कमी इसका द्योतक है । अपनी तरफ से कोशिश करता हूं कि साध कर लिखूं पर क्‍या करूं कि आपका कद ही इतना ऊँचा है कि हाथ बस हवा को ही टटोलते रह जाते हैं । शायद एक दो झिड़की पड़नी जरूरी है, कभी समय मिले तो मेरी एक-दो रचना का पूरा का पूरा पोस्‍टमार्टम कर दें, थोड़ा कष्‍ट होगा पर शायद उससे काई, झांई मिट जाएगी । सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 16, 2013 at 1:29am

ऐसी अभिनव, इतनी उच्च अभिव्यक्तियों का इस तरह से आकार ग्रहण करना सालता है. लेकिन क्या कर सकता हूँ ? संभव है, आपकी ओर समयाभाव हो.

वैसे इस बार आपका यह नवगीत बहुत-बहुत सधा हुआ है. आप बधाई लें, आदरणीय राजेश झाजी. 

सादर निवेदन : मेरे कहे का बुरा मत मानियेगा. रचना को पढ़ कर मन इतना प्रसन्न हुआ है कि पंक्ति-पंक्ति में जीता गया.

Comment by Yogi Saraswat on March 13, 2013 at 2:33pm

मन के झूमर

चुप बैठ गए

चूते अमिया

दुरकाल सखी

भ्रू-चाप चुने

महुआ नागर

मुसकै भदवा बैताल सखी

रस रस गलती

चलती चरखी

हर आस भई

पातालमुखी

अरदास खड़े

बिंदी, अंजन

दै कंगना भी सुर-ताल सखी

बहुत सुन्दर ! मन को हर्षित करते शब्द झा साब

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 13, 2013 at 10:22am

भाई राजेश झा जी बहुत सही और अच्छा लिखा है | जब मन उल्लासित होता है और अगर उसमे भी बसंत और फाल्गुन की मस्ती 

साथ हो तो फिर कंगा से भी सुर-ताल की ही सुन्दर ध्वनि सुनाई देती है | हार्दिक बधाई 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on March 13, 2013 at 7:49am

वाह वाह साहब क्या जोरदार रचना हुई है

प्रवाह भरा गीत आंचलिक शब्दों से पगा ये मधुर गीत

बहुत बहुत बधाई आपको इस सुन्दर रचना हेतु

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on March 13, 2013 at 4:19am

बहुत ही सुन्दर झा साहब!

अरदास खड़े

बिंदी, अंजन

दै कंगना भी सुर-ताल सखी

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on March 12, 2013 at 9:16pm

आदरणीय राजेश कुमार झा जी बहुत अच्छी रचना लगी,,,,,,,मेरे तरफ़ से बधाई आपको,,,,,,,भाई साहब,,,,,,,,,,,,,

Comment by mrs manjari pandey on March 12, 2013 at 6:46pm

आदरणीय    राजेश जी बहुत सुंदर रचना " बनिक भये रंगरेज मेरे बिछुवा पायल सब ........

Comment by ram shiromani pathak on March 12, 2013 at 5:37pm

बहुत बढ़िया आदरणीय राजेश जी-

रस रस गलती

चलती चरखी

हर आस भई

पातालमुखी

अरदास खड़े

बिंदी, अंजन

दै कंगना भी सुर-ताल सखी


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 12, 2013 at 4:27pm

 आदरणीय राजेश कुमार झा जी अच्छी रचना लगी, आंचलिक शब्दों का प्रयोग मुग्धकारी है,बधाई स्वीकार करें । 

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